पाकिस्तान में तुर्किये-मिस्र-सऊदी की अहम मीटिंग, तेल संकट के बीच क्या खुलेगा होर्मुज?

मिडिल ईस्ट संकट के बीच पाकिस्तान में तुर्किये, मिस्र और सऊदी अरब ने युद्ध खत्म करने और होर्मुज स्ट्रेट खोलने पर चर्चा की. प्रस्ताव अमेरिका को भेजे गए, लेकिन ईरान, अमेरिका और इजरायल बैठक में शामिल नहीं हुए.

Shraddha Mishra

इस्लामाबाद: मध्य पूर्व में जारी तनाव के बीच एक नई कूटनीतिक हलचल देखने को मिल रही है. पाकिस्तान की राजधानी में कई अहम देशों के बीच बैठक हुई, जहां ईरान और अमेरिका के बीच चल रहे टकराव को खत्म करने के रास्ते तलाशे गए. हालांकि अभी तक कोई ठोस समाधान सामने नहीं आया है, लेकिन बातचीत ने उम्मीद जरूर जगाई है कि हालात को काबू में लाया जा सकता है.

पाकिस्तान इस समय इस पूरे विवाद में मध्यस्थ की भूमिका निभा रहा है. इस्लामाबाद में हुई इस बैठक में तुर्किये, मिस्र और सऊदी अरब के प्रतिनिधियों ने हिस्सा लिया. बैठक का मुख्य उद्देश्य, ईरान और अमेरिका के बीच तनाव को कम करने के लिए संभावित समाधान ढूंढना और युद्ध को जल्द खत्म करने के विकल्पों पर विचार करना.

होर्मुज जलडमरूमध्य पर फोकस

बातचीत का बड़ा हिस्सा स्ट्रेट ऑफ होर्मुज को फिर से पूरी तरह खोलने पर केंद्रित रहा. यह समुद्री मार्ग वैश्विक तेल आपूर्ति के लिए बेहद महत्वपूर्ण है. सूत्रों के अनुसार, जहाजों की आवाजाही को सुरक्षित और नियमित बनाने के लिए कुछ नए प्रस्ताव तैयार किए गए हैं, जिन्हें अमेरिका तक पहुंचाया गया है.

चर्चा के दौरान यह भी विचार सामने आया कि इस मार्ग पर व्यापार को व्यवस्थित करने के लिए एक साझा समूह या कंसोर्टियम बनाया जा सकता है. इसमें क्षेत्र के कई देश मिलकर तेल आपूर्ति को नियंत्रित और सुरक्षित बना सकते हैं. हालांकि पाकिस्तान को भी इस योजना में शामिल होने का प्रस्ताव दिया गया, लेकिन उसने फिलहाल औपचारिक रूप से इसमें शामिल होने से इनकार किया है.

युद्धविराम को दी प्राथमिकता

तुर्किये के प्रतिनिधियों ने स्पष्ट किया कि उनकी सबसे बड़ी प्राथमिकता युद्धविराम है. उनका मानना है कि अगर समुद्री रास्ते सुरक्षित किए जाएं, तो इससे भरोसा बढ़ेगा और शांति की दिशा में कदम आगे बढ़ेंगे. इस बीच, कुछ सकारात्मक संकेत भी सामने आए हैं. जानकारी के मुताबिक, ईरान ने कुछ जहाजों को होर्मुज जलडमरूमध्य से गुजरने की अनुमति दी है, जिससे व्यापारिक गतिविधियों में थोड़ी राहत मिल सकती है.

प्रमुख देशों की गैरमौजूदगी

हालांकि इस अहम बैठक में ईरान, अमेरिका और इजरायल सीधे तौर पर शामिल नहीं थे. यही कारण है कि बातचीत के बावजूद किसी ठोस समझौते तक पहुंचना मुश्किल नजर आ रहा है. विशेषज्ञों का मानना है कि जब तक मुख्य पक्ष सीधे बातचीत में शामिल नहीं होते, तब तक स्थायी समाधान निकलना कठिन है. हालांकि, इस तरह की कूटनीतिक पहल भविष्य में बड़े समझौते की नींव रख सकती है.

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