ईरान पर हमले की तैयारी से अमेरिका में सियासी मतभेद, ट्रंप पर बढ़ रहा घरेलू दबाव
राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान के खिलाफ सख्त रुख अपनाते हुए मध्य पूर्व में सैन्य तैनाती बढ़ाई है. मिडटर्म चुनाव से पहले प्रशासन में मतभेद उभरे हैं, जहां कुछ सहयोगी अर्थव्यवस्था पर फोकस को ज्यादा जरूरी मान रहे हैं.

नई दिल्ली: मध्य पूर्व में बढ़ती हलचल के बीच अमेरिकी राजनीति भी गरमाई हुई है. राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान के खिलाफ सख्त रुख अपनाते हुए अरब सागर क्षेत्र में बड़े पैमाने पर सैन्य तैनाती की है. इस कदम से क्षेत्रीय तनाव बढ़ गया है. खास बात यह है कि यह सब ऐसे समय में हो रहा है जब अमेरिका में कुछ ही महीनों में मिडटर्म चुनाव होने वाले हैं. ऐसे में सवाल उठ रहा है कि क्या यह रणनीति राजनीतिक रूप से सही समय पर उठाया गया कदम है.
व्हाइट हाउस के सूत्रों के अनुसार, ईरान पर संभावित सैन्य कार्रवाई को लेकर प्रशासन के भीतर पूरी एकजुटता नहीं है. एक वरिष्ठ अधिकारी ने संकेत दिया कि मतदाता इस समय महंगाई और रोजमर्रा के खर्च को लेकर अधिक चिंतित हैं. ऐसे में अगर सरकार का ध्यान विदेशी तनाव पर ज्यादा दिखे, तो यह चुनावी नजरिए से जोखिम भरा हो सकता है.
व्हाइट हाउस का बचाव
रिपब्लिकन रणनीतिकारों ने भी हाल की एक बैठक में साफ कहा कि पार्टी को चुनाव में अर्थव्यवस्था को ही मुख्य मुद्दा बनाना चाहिए. उनका मानना है कि लंबा खिंचने वाला सैन्य टकराव पार्टी के लिए नुकसानदेह साबित हो सकता है. ट्रंप की राजनीति अब तक विदेशी युद्धों से दूरी और “फॉरएवर वॉर्स” खत्म करने के वादे पर टिकी रही है. हालांकि प्रशासन के दूसरे अधिकारी इस नीति का बचाव कर रहे हैं. उनका कहना है कि राष्ट्रपति की विदेश नीति “अमेरिका फर्स्ट” सोच पर आधारित है. उनका दावा है कि हर कदम का मकसद देश की सुरक्षा और आर्थिक हितों की रक्षा करना है.
ईरान को लगातार चेतावनी
राष्ट्रपति ट्रंप ने हाल ही में फिर दोहराया कि तेहरान को “न्यायसंगत समझौता” करना चाहिए. उन्होंने स्पष्ट किया है कि ईरान को परमाणु हथियार विकसित करने या यूरेनियम संवर्धन की अनुमति नहीं दी जा सकती. प्रशासन का कहना है कि कूटनीति को प्राथमिकता दी जा रही है, लेकिन समय रहते समाधान जरूरी है.
आलोचकों का कहना है कि संभावित हमले की रणनीति को लेकर स्पष्टता की कमी है. पहले भी ट्रंप ने ईरान में प्रदर्शनों के दौरान सख्त बयान दिए थे, लेकिन बाद में कदम पीछे खींच लिए थे. हाल में उन्होंने ईरान के परमाणु कार्यक्रम को खत्म करने और यहां तक कि सत्ता परिवर्तन की बात भी कही, पर यह साफ नहीं किया कि यह लक्ष्य कैसे हासिल किया जाएगा.
चुनावी असर और अंतरराष्ट्रीय छवि
रिपोर्टों के मुताबिक, महंगाई और आर्थिक मुद्दे अब भी अमेरिकी मतदाताओं के लिए सबसे अहम हैं. इतिहास बताता है कि मिडटर्म चुनावों में विदेश नीति अक्सर निर्णायक मुद्दा नहीं बनती. लेकिन यदि भारी सैन्य जमावड़े के बाद कोई कार्रवाई नहीं होती, तो अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अमेरिका की छवि कमजोर पड़ने का खतरा भी है.


