हार्वर्ड वैज्ञानिक ने फिजिक्स के सूत्रों से खोजा स्वर्ग, ब्रह्मांड के रहस्य पर नया दावा सामने

स्वर्ग सिर्फ आस्था का विषय नहीं बल्कि विज्ञान की कसौटी पर भी चर्चा का विषय बन गया है। हार्वर्ड के एक वैज्ञानिक ने ब्रह्मांड के गणित से स्वर्ग की संभावना जताई है।

Lalit Sharma
Edited By: Lalit Sharma

अब तक स्वर्ग को धर्म और आस्था से जोड़कर देखा जाता रहा है। लेकिन अब विज्ञान भी इस सवाल में शामिल हो गया है। हार्वर्ड यूनिवर्सिटी के एक पूर्व प्रोफेसर ने दावा किया है कि स्वर्ग ब्रह्मांड में मौजूद हो सकता है। उनका कहना है कि आधुनिक फिजिक्स और खगोल विज्ञान इस संभावना को नकारते नहीं हैं। उन्होंने धर्म और विज्ञान के बीच की दूरी को पाटने की कोशिश की है। यह दावा लोगों को चौंका रहा है। दुनियाभर में इस पर बहस शुरू हो गई है।

कौन हैं यह हार्वर्ड के वैज्ञानिक?

यह दावा करने वाले वैज्ञानिक हैं डॉ. माइकल गुइलेन जो कभी हार्वर्ड यूनिवर्सिटी में प्रोफेसर रह चुके हैं। उन्होंने फिजिक्स, मैथ्स और एस्ट्रोनॉमी में डॉक्टरेट की है। गुइलेन ने सवाल उठाया कि अगर स्वर्ग है तो उसकी भौतिक स्थिति क्या हो सकती है। उन्होंने इसे केवल धार्मिक कल्पना मानकर खारिज नहीं किया। बल्कि गणितीय मॉडल के जरिए समझने की कोशिश की। यही वजह है कि उनका दावा चर्चा में है।

क्यों सदियों से उलझा रहा यह सवाल?

गुइलेन का कहना है कि स्वर्ग का सवाल सदियों से इंसान को उलझाता रहा है। वैज्ञानिक इसे कल्पना मानते रहे। धार्मिक लोग इसे आस्था का सत्य कहते रहे। इस वजह से समाज दो हिस्सों में बंटा रहा। लेकिन आधुनिक खगोल विज्ञान ने नई संभावनाएं खोली हैं। अब ब्रह्मांड को पहले से ज्यादा समझा जा रहा है। इसी समझ ने इस पुराने सवाल को नए तरीके से देखने का मौका दिया है।

ब्रह्मांड के फैलने से क्या जुड़ा है स्वर्ग का विचार?

गुइलेन की थ्योरी ब्रह्मांड के लगातार फैलने के सिद्धांत पर आधारित है। यह सिद्धांत पहली बार एडविन हबल ने 1929 में दिया था। उन्होंने बताया था कि गैलेक्सियां एक-दूसरे से दूर जा रही हैं। जितनी दूर गैलेक्सी होती है, उसकी गति उतनी तेज होती है। इससे साबित हुआ कि ब्रह्मांड स्थिर नहीं है। यह लगातार फैल रहा है। गुइलेन मानते हैं कि यही फैलाव स्वर्ग के स्थान से जुड़ा हो सकता है।

क्या ब्रह्मांड की एक ऐसी सीमा है जहां कोई नहीं पहुंच सकता?

गुइलेन के अनुसार ब्रह्मांड में एक सीमा मौजूद है। इस सीमा को वैज्ञानिक भाषा में कॉस्मिक होराइजन कहा जाता है। यहां तक इंसान, रॉकेट या कोई यान नहीं पहुंच सकता। इस विचार को उन्होंने अल्बर्ट आइंस्टीन के सिद्धांत से जोड़ा है। उनके मुताबिक इस सीमा तक सिर्फ रोशनी पहुंच सकती है। इसके आगे क्या है, यह इंसानी आंखों से बाहर है।

क्या धार्मिक ग्रंथ भी इसी दिशा में इशारा करते हैं?

धार्मिक ग्रंथों में स्वर्ग को हमेशा ऊपर बताया गया है। ऊपर यानी सबसे ऊंचा स्थान। गुइलेन का कहना है कि कॉस्मिक होराइजन वही ‘ऊपर’ हो सकता है। जहां विज्ञान की पहुंच खत्म हो जाती है। वहीं से आस्था शुरू होती है। यह विचार विज्ञान और धर्म को जोड़ने की कोशिश करता है। इसी वजह से यह दावा लोगों को सोचने पर मजबूर कर रहा है।

तो क्या स्वर्ग ब्रह्मांड के अनदेखे हिस्से में है?

विज्ञान मानता है कि जो ब्रह्मांड हमें दिखता है, वह पूरा नहीं है। उसके बाहर भी बहुत कुछ मौजूद हो सकता है। लेकिन वहां न देखा जा सकता है और न पहुंचा जा सकता है। गुइलेन के अनुसार स्वर्ग उसी अनदेखे हिस्से में हो सकता है। हालांकि यह अभी एक थ्योरी है। इसकी पुष्टि संभव नहीं है। लेकिन इसने स्वर्ग पर नई बहस जरूर छेड़ दी है।

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