कैसे करें असली पश्मीना शॉल की पहचान? जानिए आसान तरीके

पश्मीना शॉल, कश्मीर और लद्दाख की सदियों पुरानी परंपरा, हुनर और सांस्कृतिक विरासत का प्रतीक है. हालांकि, बढ़ती मांग के साथ बाजार में नकली और मिलावटी पश्मीना शॉल की भरमार हो गई है. लेकिन कुछ अहम बातों पर ध्यान देकर आप आसानी से असली और नकली पश्मीना के बीच फर्क कर सकते हैं.

Suraj Mishra
Edited By: Suraj Mishra

पश्मीना शॉल को सिर्फ सर्दियों में ओढ़े जाने वाले ऊनी कपड़े के रूप में देखना गलत होगा. यह कश्मीर और लद्दाख की सदियों पुरानी परंपरा, हुनर और सांस्कृतिक विरासत का प्रतीक है. हालांकि, बढ़ती मांग के साथ बाजार में नकली और मिलावटी पश्मीना शॉल की भरमार हो गई है. ऐसे में अगर आप 30 से 40 हजार रुपये या उससे अधिक की रकम खर्च करने की सोच रहे हैं तो पहले यह जान लेना बेहद जरूरी है कि जो शॉल आप खरीद रहे हैं वह असली है या नहीं.

आजकल कई नकली या सेमी-सिंथेटिक शॉल इतने आकर्षक ढंग से बनाए जाते हैं कि वे पहली नजर में बिल्कुल असली पश्मीना जैसे दिखाई देते हैं. यही वजह है कि ग्राहक धोखा खा जाते हैं और ऊंची कीमत चुका देते हैं. लेकिन कुछ अहम बातों पर ध्यान देकर आप आसानी से असली और नकली पश्मीना के बीच फर्क कर सकते हैं.

ऊन के स्रोत को समझना जरूरी 

सबसे पहले ऊन के स्रोत को समझना जरूरी है. असली पश्मीना लद्दाख क्षेत्र में पाई जाने वाली चांगथांगी नस्ल की बकरियों के बेहद मुलायम अंडरकोट से तैयार किया जाता है. ये बकरियां अत्यधिक ठंडे इलाकों में रहती हैं, जिससे उनके बाल असाधारण रूप से हल्के, गर्म और कोमल होते हैं. यही कारण है कि असली पश्मीना की गर्माहट और नर्मी किसी अन्य ऊन में नहीं मिलती.

वजन में हल्का

वजन भी पश्मीना की पहचान का एक बड़ा संकेत है. शुद्ध पश्मीना शॉल आश्चर्यजनक रूप से बहुत हल्का होता है. आमतौर पर इसका वजन लगभग 180 ग्राम तक होता है, जबकि पश्मीना स्टोल का वजन 90–100 ग्राम के आसपास हो सकता है. यदि शॉल हाथ में लेने पर भारी लगे तो उसकी शुद्धता पर सवाल उठाया जा सकता है.

बर्न टेस्ट

पश्मीना की जांच का एक पारंपरिक और कारगर तरीका बर्न टेस्ट भी माना जाता है. इसके लिए शॉल के किनारे से एक छोटा धागा निकालकर जलाया जाता है. असली पश्मीना धीरे-धीरे जलता है और उससे जले हुए बालों जैसी गंध आती है. जलने के बाद इसकी राख बारीक पाउडर के रूप में बदल जाती है. वहीं नकली या सिंथेटिक धागा जलने पर पिघलता है, प्लास्टिक जैसी बदबू देता है और सख्त गांठ बन जाता है.

बुनावट और फिनिशिंग

इसके अलावा बुनावट और फिनिशिंग पर भी ध्यान देना चाहिए. असली पश्मीना के धागे इतने महीन होते हैं कि उन्हें मशीन से नहीं बुना जा सकता. इसलिए यह हमेशा हाथ से बुना जाता है. हाथ से बुने गए शॉल में हल्की-सी असमानता दिख सकती है जो उसकी प्रामाणिकता का संकेत होती है. बहुत ज्यादा परफेक्ट और मशीन जैसी फिनिशिंग वाले शॉल से सावधान रहना चाहिए.

अंत में, खरीदते समय जीआई (जियोग्राफिकल इंडिकेशन) टैग जरूर जांचें. यह टैग इस बात की गारंटी देता है कि पश्मीना शॉल कहां और किस परंपरा के तहत बनाया गया है. महंगे निवेश से पहले यह छोटी-सी जांच आपको बड़े नुकसान से बचा सकती है.

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