क्या है चीन का 9-9-6 वर्क कल्चर ? जिसे नारायण मूर्ति ने बताया विकास की कुंजी
नारायण मूर्ति ने फिर कहा कि भारत की तेजी से प्रगति के लिए युवाओं को अधिक घंटे काम करने चाहिए और उदाहरण के तौर पर चीन की 9-9-6 संस्कृति का ज़िक्र किया. दूसरी ओर, सोशल मीडिया के प्रभाव से बढ़ती “ट्रैवल डिस्मॉर्फिया” की भावना लोगों में असंतोष, तुलना और FOMO को बढ़ा रही है.

नई दिल्ली : इंफोसिस के सह-संस्थापक नारायण मूर्ति ने एक बार फिर काम के घंटों, उत्पादकता और भारत की विकास गति पर अपनी स्पष्ट राय रखी है. हाल के एक इंटरव्यू में 79 वर्षीय मूर्ति ने चीन की प्रसिद्ध ‘9-9-6’ वर्क कल्चर यानी सुबह 9 से रात 9 बजे तक, हफ्ते में छह दिन का उदाहरण देते हुए कहा कि युवा भारतीयों को भी अधिक घंटों तक काम करना चाहिए ताकि देश तेजी से आगे बढ़ सके.
आपको बता दें कि मूर्ति इससे पहले 2023 में तब सुर्खियों में आए थे, जब उन्होंने भारतीयों को राष्ट्र-निर्माण के लिए सप्ताह में 70 घंटे काम करने की सलाह दी थी. इस बार उन्होंने चीन की तेज़ गति से हुई आर्थिक तरक्की का हवाला देकर कहा कि लगातार और लंबे समय तक की गई मेहनत किसी भी देश की प्रगति में निर्णायक भूमिका निभाती है.
10 मे से एक मानसिक दबाव का अनुभव
उधर, एक अलग सामाजिक परिघटना भी चर्चा का विषय बनी हुई है ‘ट्रैवल डिस्मॉर्फिया’. Talker Research के एक सर्वे के अनुसार, हर दस में से एक अमेरिकी मानता है कि वह इस मानसिक दबाव का अनुभव कर चुका है. यह सुनकर हैरानी भी नहीं होती, क्योंकि FOMO यानी ‘फियर ऑफ मिसिंग आउट’ पहले से ही बहुत तेज़ी से बढ़ रहा है. सोशल मीडिया पर दिखने वाले खूबसूरत वीडियो, सौंदर्यपूर्ण रीइल्स और ‘हिडन जेम’ जैसी जगहों की झलकियों ने लोगों के भीतर लगातार घूमने-फिरने की एक इच्छा को जन्म दे दिया है और उसके साथ तुलना का भाव भी.
क्यों बढ़ रहा है यह भाव?
‘ट्रैवल डिस्मॉर्फिया’ नाम सुनते ही मन में ‘बॉडी डिस्मॉर्फिया’ जैसा कुछ उभर आता है जहां व्यक्ति लगातार सोचता है कि वह दूसरों से कमतर है. यात्रा से जुड़ा यह नया भाव भी इसी मनोवैज्ञानिक ढांचे पर चलता है: स्वयं की तुलना, लगातार असंतोष, यह डर कि कहीं दूसरे लोग उससे “ज्यादा जी” नहीं रहे.
आधे से भी कम लोग जीवनभर की यात्राओं से संतुष्ट
सर्वे की बात करें तो लगभग दो हजार वयस्कों में से आधे से भी कम लोग अपनी जीवनभर की यात्राओं से संतुष्ट पाए गए. यह असंतोष दिखाता है कि सोशल मीडिया का प्रभाव कितना गहरा हो चुका है. इंस्टाग्राम की चमकदार तस्वीरों के पीछे की वास्तविकता ज्यादातर लोगों को दिखाई नहीं देती यात्रा का थकान भरा पक्ष, खर्चे, परेशानियाँ ये सब फिल्टर के बाहर रह जाते हैं. लेकिन तुलना लगातार जारी रहती है, और लोग महसूस करते हैं कि वे किसी अदृश्य दौड़ में पीछे रह गए हैं.
दबाव, अंदर ही अंदर खालीपन पैदा कर रहा
विशेषज्ञ भी मानते हैं कि सोशल मीडिया ने आत्म-मूल्यांकन की परिभाषा बदल दी है. काउंसलिंग मनोवैज्ञानिक डॉ. नंदिता कालरा के अनुसार, अब लोग यह सोचने लगे हैं कि यदि वे ट्रेंड में शामिल नहीं हैं, तो क्या वे मायने रखते भी हैं? देखने वाली बात यह है कि यह सोच व्यक्ति को उसकी असल पसंद से दूर ले जाती है. कहीं जाना पसंद है या नहीं, यह प्रश्न गौण हो जाता है मुख्य चिंता यह बन जाती है कि पोस्ट पर कितने लाइक्स आएंगे. यही निरंतर दबाव अंदर ही अंदर एक खालीपन पैदा करता है.
यात्रा का असली उद्देश्य क्या खो रहा है?
यात्रा हमेशा से मन को हल्का करने, खुद को समझने, या थोड़ी देर सांस लेने का तरीका रही है. लेकिन जब छुट्टियों का उद्देश्य आनंद लेने से हटकर दूसरों को दिखाने की चीज बन जाए, तो यात्रा का मूल अनुभव फीका पड़ जाता है. कई लोग अब अपनी अगली यात्रा इस आधार पर तय करते हैं कि सोशल मीडिया पर क्या वायरल है, कौन-सी लोकेशन ट्रेंड कर रही है. यह गलत नहीं है, लेकिन खतरनाक तब होता है जब तुलना आपके अनुभव का आधार बन जाए.
ट्रैवल डिस्मॉर्फिया से बचने का रास्ता
आज के डिजिटल युग में ‘किपिंग अप’ की भावना से पूरी तरह बच पाना शायद असंभव हो, लेकिन यह याद रखना जरूरी है कि यात्रा आपके लिए है आपकी शांति, आपके अनुभव और आपकी यादों के लिए. इंस्टाग्राम की सौंदर्यपूर्ण तस्वीरें खत्म हो जाएँगी, लेकिन सफर में महसूस की गई खुशी और सीखे गए अनुभव आपके साथ रहेंगे. इसलिए अगली बार जब आप किसी यात्रा की योजना बनाएँ, तो यह सोचकर जाएँ कि आपको क्या अच्छा लगता है न कि यह कि दुनिया क्या देखना चाहती है.


