Magh Purnima2026: माघ पूर्णिमा क्यों है इतनी खास? जानें महत्व, पूजा विधि और धार्मिक मान्यताएं
हिंदू धर्म में पूर्णिमा का दिन खास धार्मिक महत्व रखता है. साल की बारह पूर्णिमाओं में से माघ महीने की पूर्णिमा को बहुत शुभ माना जाता है और इसे माघ पूर्णिमा या माघी पूर्णिमा के नाम से जाना जाता है. इस दिन संगम में स्नान करने से भगवान विष्णु का आशीर्वाद प्राप्त होता है, पापों का नाश होता है और मोक्ष की प्राप्ति होती है.

माघ पूर्णिमा 2026: हिंदू धर्म में प्रत्येक माह शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा तिथि का विशेष धार्मिक महत्व होता है. वर्ष में आने वाली 12 पूर्णिमाओं में माघ माह की पूर्णिमा को अत्यंत पुण्यदायी माना जाता है, जिसे माघ पूर्णिमा या माघी पूर्णिमा कहा जाता है.माघ पूर्णिमा के अवसर पर प्रयागराज के माघ मेले में गंगा और संगम तट पर श्रद्धालु, कल्पवासी और साधु-संत बड़ी संख्या में आस्था की डुबकी लगाते हैं. मान्यता है कि इस दिन संगम में स्नान करने से भगवान विष्णु का आशीर्वाद प्राप्त होता है
माघ पूर्णिमा क्यों है खास
माघ पूर्णिमा, जिसे माघी पूर्णिमा भी कहा जाता है, हिंदू धर्म में विशेष रूप से महत्वपूर्ण है क्योंकि माना जाता है कि इस दिन स्वयं भगवान विष्णु गंगाजल में वास करते हैं और देवता धरती पर आकर संगम में स्नान करते हैं.इस दिन पवित्र नदियों में स्नान, दान (तिल, कंबल), और व्रत रखने से अक्षय पुण्य, मोक्ष और पापों से मुक्ति मिलती है, साथ ही यह माघ माह के कल्पवास का समापन भी होता है.
कब है माघ पूर्णिमा 2026
पंचांग के अनुसार, माघ माह के शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा तिथि 01 फरवरी 2026, रविवार को सुबह 05 बजकर 52 मिनट पर आरंभ होगी. वहीं, इस तिथि का समापन 02 फरवरी 2026, सोमवार को तड़के 03 बजकर 38 मिनट पर होगा.
माघ पूर्णिमा शुभ मुहूर्त
माघ पूर्णिमा के दिन ब्रह्म मुहूर्त सुबह 05 बजकर 24 मिनट से शुरू होकर 06 बजकर 17 मिनट तक रहेगा. इस समय स्नान करना विशेष फलदायी माना गया है.
- अभिजीत मुहूर्त दोपहर 12 बजकर 13 मिनट से 12 बजकर 57 मिनट तक रहेगा.
- विजय मुहूर्त दोपहर 02 बजकर 23 मिनट से 03 बजकर 07 मिनट तक होगा.
- गोधूलि मुहूर्त शाम 05 बजकर 58 मिनट से 06 बजकर 24 मिनट तक रहेगा.
माघ पूर्णिमा पूजा विधि
माघ पूर्णिमा के दिन ब्रह्म मुहूर्त में उठकर गंगा नदी में स्नान करें. यदि यह संभव न हो, तो घर के पानी में गंगाजल मिलाकर स्नान किया जा सकता है. स्नान के बाद पीले वस्त्र धारण करें और भगवान सूर्य को अर्घ्य दें.
इसके पश्चात पंचोपचार विधि से लक्ष्मी-नारायण का पूजन करें और सत्यनारायण कथा का पाठ करें. पूजा के अंत में भगवान की आरती करें और प्रसाद का वितरण करें.


