BMC चुनाव में ठाकरे ब्रदर्स के सर्वाइवल पर सवाल, बीजेपी-शिंदे गठबंधन से सीधा मुकाबला

करीब चार साल बाद हुए बीएमसी चुनाव में 227 वार्डों के लिए मतदान संपन्न हुआ. बदले राजनीतिक हालात में बीजेपी-शिंदे शिवसेना और ठाकरे बंधुओं के गठबंधन के बीच मुख्य मुकाबला है. अब सभी की नजरें मतगणना पर टिकी हैं.

Shraddha Mishra

मुंबई: बृहन्मुंबई महानगरपालिका (बीएमसी) में लगभग चार साल के लंबे इंतजार के बाद आखिरकार 15 जनवरी को मतदान संपन्न हो गया. इससे पहले बीएमसी के चुनाव वर्ष 2017 में हुए थे और निर्वाचित सदन का कार्यकाल मार्च 2022 में समाप्त हो गया था. कानूनी और प्रशासनिक कारणों से चुनाव लगातार टलते रहे, जिसके बाद अब जाकर मुंबई के मतदाताओं को अपने प्रतिनिधि चुनने का मौका मिला.

बीएमसी चुनाव में इस बार करीब 1 करोड़ 3 लाख मतदाता पंजीकृत थे. मतदान के लिए पूरे मुंबई में 10,232 मतदान केंद्र बनाए गए थे. बीएमसी में कुल 227 कॉर्पोरेटर चुने जाते हैं और किसी भी दल या गठबंधन को महापौर बनाने के लिए 114 सीटों की जरूरत होती है. इस चुनाव में लगभग 1,700 उम्मीदवारों की राजनीतिक किस्मत दांव पर लगी हुई है.

बदले हालात में पहला बीएमसी चुनाव

यह चुनाव कई मायनों में ऐतिहासिक माना जा रहा है. पिछले तीन दशकों से बीएमसी पर शिवसेना का दबदबा रहा है, लेकिन शिवसेना के दो धड़ों में विभाजन के बाद यह पहला बीएमसी चुनाव है. सत्तारूढ़ महायुति के तहत भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) और एकनाथ शिंदे के नेतृत्व वाली शिवसेना मिलकर चुनाव मैदान में उतरी हैं.

वहीं दूसरी ओर, शिवसेना (उद्धव बालासाहेब ठाकरे) और महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना (एमएनएस) का साथ आना इस चुनाव की सबसे बड़ी राजनीतिक घटना मानी जा रही है. करीब 20 साल बाद ठाकरे परिवार के दो प्रमुख नेता- उद्धव ठाकरे और राज ठाकरे बीएमसी चुनाव में एक साथ नजर आए.

किस दल ने कितनी सीटों पर लड़ा चुनाव

227 वार्डों वाली बीएमसी में बीजेपी ने 137 सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारे, जबकि शिंदे गुट की शिवसेना ने 90 सीटों पर चुनाव लड़ा. अजित पवार की एनसीपी इस गठबंधन का हिस्सा नहीं रही और उसने 90 सीटों पर उम्मीदवार खड़े किए. दूसरी ओर, शिवसेना (यूबीटी) ने 163 सीटों पर चुनाव लड़ा, जबकि एमएनएस ने 52 सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारे. कांग्रेस ने 143 सीटों पर उम्मीदवार खड़े किए और उसने प्रकाश आंबेडकर की वंचित बहुजन आघाड़ी के साथ गठबंधन किया, जिसने 46 सीटों पर चुनाव लड़ा.

ठाकरे बंधुओं के लिए क्यों अहम है यह चुनाव

राजनीतिक विश्लेषकों के मुताबिक, बीएमसी चुनाव उद्धव ठाकरे और राज ठाकरे- दोनों के लिए अस्तित्व की लड़ाई बन चुका है. 2024 के विधानसभा चुनाव में उद्धव ठाकरे की पार्टी को सीमित सफलता मिली थी, जबकि राज ठाकरे की एमएनएस को एक भी सीट नहीं मिली.

विशेषज्ञों का मानना है कि बीएमसी हमेशा से शिवसेना की राजनीतिक ताकत का केंद्र रही है. मुंबई से ही शिवसेना का उदय हुआ और नगर निगम की सत्ता ने पार्टी को संगठनात्मक और आर्थिक मजबूती दी. ऐसे में उद्धव ठाकरे के लिए बीएमसी में अच्छी स्थिति बनाना बेहद जरूरी माना जा रहा है.

वहीं राज ठाकरे के लिए भी यह चुनाव निर्णायक है. 2007 और 2012 में एमएनएस ने बीएमसी में मजबूत उपस्थिति दर्ज कराई थी, लेकिन इसके बाद पार्टी का ग्राफ लगातार गिरता गया. 2024 के विधानसभा चुनाव में असफलता के बाद बीएमसी चुनाव उनके लिए राजनीतिक पुनरुत्थान का अवसर माना जा रहा है.

मुंबई में बीजेपी बनी सबसे बड़ी चुनौती

पिछले एक दशक में मुंबई में बीजेपी की ताकत लगातार बढ़ी है. 2017 के बीएमसी चुनाव में बीजेपी ने अपने कॉर्पोरेटरों की संख्या 31 से बढ़ाकर 82 कर ली थी. 2024 के विधानसभा चुनाव में बीजेपी राज्य की सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी और मुख्यमंत्री पद भी हासिल किया. राजनीतिक जानकारों के अनुसार, मुंबई में ठाकरे बंधुओं के लिए सबसे बड़ी चुनौती अब बीजेपी ही है. बीजेपी की गैर-मराठी वोट बैंक पर मजबूत पकड़ है, जबकि मराठी वोटों को साधने के लिए उसने शिंदे गुट की शिवसेना को अपने साथ बनाए रखा है.

कांग्रेस और अन्य दलों की भूमिका

बीएमसी में कांग्रेस का प्रभाव समय के साथ कमजोर हुआ है। कभी 51 कॉर्पोरेटर रखने वाली कांग्रेस 2017 में 31 सीटों तक सिमट गई थी. हालांकि, मुस्लिम और दलित मतदाताओं के समर्थन के चलते कांग्रेस-वंचित बहुजन आघाड़ी गठबंधन को पूरी तरह नजरअंदाज नहीं किया जा सकता.

राजनीतिक विश्लेषण के अनुसार, मुख्य मुकाबला बीजेपी-शिंदे शिवसेना गठबंधन और ठाकरे बंधुओं के गठबंधन के बीच ही माना जा रहा है, लेकिन कांग्रेस और वंचित बहुजन आघाड़ी कुछ सीटों पर नतीजों को प्रभावित कर सकती हैं. अब सबकी नजरें मतगणना पर टिकी हैं, जिसके बाद यह साफ हो जाएगा कि मुंबई की सत्ता किसके हाथ में जाती है और महाराष्ट्र की शहरी राजनीति किस दिशा में आगे बढ़ती है.

ताजा खबरें

ट्रेंडिंग वीडियो

close alt tag