महाराष्ट्र में BJP को बड़ा झटका, शिंदे की मौजूदगी में 5 पूर्व पार्षद शिवसेना में शामिल
उल्हासनगर में भाजपा को बड़ा झटका लगा है जब पांच पूर्व पार्षदों ने पार्टी से इस्तीफा देकर एकनाथ शिंदे की शिवसेना में शामिल हो गए. इन नेताओं का कहना है कि राज्य भाजपा अध्यक्ष रविंद्र चव्हाण की कार्यशैली से असंतोष था.

महाराष्ट्र : उल्हासनगर में भारतीय जनता पार्टी (भा.ज.पा.) को एक बड़ा राजनीतिक झटका लगा है, जब नगरपालिका के पांच प्रमुख पूर्व पार्षदों ने पार्टी से इस्तीफा दे दिया और एकनाथ शिंदे के नेतृत्व वाली शिवसेना में शामिल हो गए. इस घटनाक्रम ने भाजपा के लिए खासा सिरदर्द पैदा कर दिया है, खासकर आगामी नगरपालिका चुनावों को ध्यान में रखते हुए. इस्तीफा देने वाले नेताओं में जम्नू पुरसवानी, प्रकाश माखीजा, महेश सुखरामानी, किशोर वनवारी और मीना सोनदे जैसे प्रमुख नेता शामिल हैं.
पार्टी की कार्यशैली पर असंतोष के बाद इस्तीफा
विकास निधि के ठप होने का आरोप
एक अन्य महत्वपूर्ण कारण जो इन नेताओं ने उठाया, वह था 2023 में विधायक को आवंटित 30 करोड़ रुपये की विकास निधि का ठप होना. इन नेताओं का आरोप था कि रविंद्र चव्हाण के फैसलों के कारण यह फंड अटका रहा, जिससे कई जरूरी विकास कार्य रुक गए और आम जनता में नाराजगी बढ़ी. इससे यह स्पष्ट होता है कि भाजपा के भीतर स्थानीय नेताओं का असंतोष और विकास कार्यों में रुकावट ने पार्टी को एक बड़ा नुकसान पहुंचाया है.
शिवसेना में शामिल होने का निर्णय
हालांकि, इन नेताओं ने शुरुआत में अन्य दलों से जुड़ने का विचार किया था, लेकिन अंत में उन्होंने शिंदे की शिवसेना को चुना. सूत्रों के मुताबिक, इन नेताओं ने हिंदुत्व और एनडीए की विचारधारा के साथ अपनी राजनीति को आगे बढ़ाने का निर्णय लिया. शिवसेना का चुनाव इसीलिए किया गया, क्योंकि यह पार्टी राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (NDA) के ढांचे में बनी हुई है, जिससे उनका अपना राजनीतिक दृष्टिकोण मेल खाता है. इसके साथ ही, इन नेताओं ने आगामी नगरपालिका चुनावों के लिए भाजपा-शिवसेना गठबंधन की भी मांग की, जिसे स्थानीय स्तर पर काफी समर्थन मिल रहा था.
भा.ज.पा. के लिए चुनावी चुनौतियां
उल्हासनगर में इन अनुभवी नेताओं का पार्टी छोड़ना भाजपा के लिए बड़ा झटका साबित हो सकता है. खासकर सिंधी समुदाय में जम्नू पुरसवानी जैसे नेताओं का प्रभाव काफी मजबूत है, और उनका शिवसेना में शामिल होना भाजपा के लिए नुकसानदायक हो सकता है. यह घटनाक्रम उल्हासनगर के राजनीतिक समीकरणों को प्रभावित करेगा, और पार्टी के लिए आगामी नगरपालिका चुनावों में मुश्किलें बढ़ा सकता है. भाजपा को अब इन नेताओं के जाने के बाद अपनी कार्यशैली और स्थानीय नेताओं के अधिकारों पर पुनर्विचार करना होगा, यदि वह चुनाव में अपनी स्थिति को मजबूत बनाए रखना चाहती है.


