रथ पर बैठकर स्नान करने नहीं जाना...शंकराचार्य विवाद पर भड़के जगद्गुरु रामभद्राचार्य, बोले- शास्त्र के विरुद्ध काम नहीं करना चाहिए

प्रयागराज संगम स्नान को लेकर रथ पर जाने के विवाद पर जगद्गुरु स्वामी रामभद्राचार्य ने कड़ी प्रतिक्रिया दी है. उन्होंने इसे शास्त्रों के खिलाफ बताते हुए कहा कि संतों को स्नान के लिए पैदल जाना चाहिए.

Utsav Singh
Edited By: Utsav Singh

उत्तर प्रदेश : प्रयागराज में संगम स्नान को जाते समय रथ पर सवार होने को लेकर उठे विवाद पर अब जगद्गुरु स्वामी रामभद्राचार्य ने खुलकर नाराजगी जताई है. उन्होंने इस पूरे घटनाक्रम को शास्त्रों के विरुद्ध बताते हुए कहा कि शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद को रथ या पहिया लगी पालकी पर बैठकर गंगा स्नान के लिए नहीं जाना चाहिए था. रामभद्राचार्य ने स्पष्ट कहा कि शास्त्रों में स्नान के लिए इस तरह के प्रदर्शन की अनुमति नहीं है और जो भी शास्त्र विरुद्ध आचरण करता है, उसे न सुख मिलता है और न ही शांति.

शास्त्रों के पालन पर दिया जोर

तुलसी पीठाधीश्वर जगद्गुरु रामभद्राचार्य ने मंगलवार को पत्रकारों से बातचीत के दौरान कहा कि वह स्वयं और उनके जैसे अन्य संत स्नान के लिए पैदल जाते हैं. उन्होंने कहा कि धर्माचार्यों को अपने आचरण से उदाहरण प्रस्तुत करना चाहिए, न कि ऐसे कार्य करने चाहिए जो शास्त्रों के विपरीत हों. उन्होंने यह भी कहा कि प्रयागराज में जो कुछ हुआ, वह स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद और सरकार के बीच का विषय है, लेकिन रथ पर बैठकर स्नान के लिए जाना किसी भी दृष्टि से उचित नहीं ठहराया जा सकता.

मणिकर्णिका घाट पर मूर्तियों के मुद्दे पर सफाई
जगद्गुरु रामभद्राचार्य ने काशी के मणिकर्णिका घाट पर मूर्तियों को तोड़े जाने के मामले पर भी अपनी बात रखी. उन्होंने कहा कि स्थापित और प्रमाणित मूर्तियों को तोड़ा जाना उचित नहीं है, लेकिन यह भी संभव है कि जन सुविधा के लिए क्षेत्र का विस्तार किया जा रहा हो. उन्होंने जानकारी दी कि वहां प्रमाणित मूर्तियों को नुकसान नहीं पहुंचाया गया है. इस बयान के जरिए उन्होंने धार्मिक आस्था और जनहित के बीच संतुलन बनाए रखने की आवश्यकता पर जोर दिया.

तुलसी पीठ पहुंचे बागेश्वरधाम सरकार
इसी बीच बागेश्वरधाम के पीठाधीश्वर आचार्य धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री सोमवार देर शाम धर्मनगरी चित्रकूट स्थित तुलसी पीठ पहुंचे. उन्होंने अपने गुरु जगद्गुरु स्वामी रामभद्राचार्य से मुलाकात कर आशीर्वाद लिया. उनके आगमन की सूचना मिलते ही बड़ी संख्या में श्रद्धालु तुलसी पीठ पहुंच गए. हालांकि आचार्य धीरेंद्र शास्त्री कुछ देर रुकने के बाद बांदा के लिए रवाना हो गए. इस मुलाकात को धार्मिक जगत में गुरु-शिष्य परंपरा के रूप में देखा गया.

मौनी अमावस्या पर कैसे शुरू हुआ विवाद
यह पूरा विवाद मौनी अमावस्या के दिन शुरू हुआ, जब स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती पहिया लगी पालकी से संगम स्नान के लिए जा रहे थे. पुलिस और प्रशासन ने उन्हें इसी पालकी के माध्यम से स्नान के लिए जाने से रोक दिया. इससे नाराज होकर उन्होंने बिना स्नान किए ही वापस लौटने का फैसला किया. स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद ने आरोप लगाया कि उनके कई शिष्यों के साथ पुलिस ने मारपीट की और उन्हें संगम तट से हटा दिया गया. उन्होंने यह भी कहा कि उन्हें जहां छोड़ा गया है, वे वहीं रहेंगे और अपने शिविर में प्रवेश नहीं करेंगे.

प्रशासन की ओर से दिया गया स्पष्टीकरण
स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद के आरोपों के बाद मंडलायुक्त सौम्या अग्रवाल और पुलिस आयुक्त जोगेंद्र कुमार ने संयुक्त रूप से प्रेस वार्ता कर स्थिति स्पष्ट की. अधिकारियों ने कहा कि उन्हें संगम स्नान से नहीं रोका गया था, बल्कि पहिया लगी पालकी के माध्यम से स्नान के लिए जाने पर आपत्ति जताई गई थी. प्रशासन ने उनसे पैदल जाकर स्नान करने का आग्रह किया था, जिसे लेकर गलतफहमी और विवाद की स्थिति बनी.

‘शंकराचार्य’ उपाधि को लेकर नोटिस
इस विवाद के बीच प्रयागराज मेला प्राधिकरण ने स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती को नोटिस जारी किया है. नोटिस में उनसे 24 घंटे के भीतर स्पष्टीकरण मांगा गया है कि वे अपने नाम के आगे ‘शंकराचार्य’ शब्द का प्रयोग कर स्वयं को ज्योतिष्पीठ का शंकराचार्य कैसे घोषित कर रहे हैं. नोटिस में सुप्रीम कोर्ट की अपील संख्या 3011/2020 और 14 अक्टूबर 2022 के आदेश का हवाला देते हुए कहा गया है कि मामला अभी न्यायालय में विचाराधीन है और जब तक इसका अंतिम निस्तारण नहीं हो जाता, तब तक कोई भी धर्माचार्य ज्योतिष्पीठ के शंकराचार्य के रूप में पट्टाभिषेकित नहीं हो सकता.

सुप्रीम कोर्ट के आदेश की अवहेलना का आरोप
मेला प्राधिकरण ने नोटिस में यह भी उल्लेख किया है कि इसके बावजूद माघ मेला क्षेत्र में लगाए गए शिविर और बोर्ड पर स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद ने स्वयं को ज्योतिष्पीठ का शंकराचार्य घोषित किया है, जो सुप्रीम कोर्ट के आदेश की अवहेलना की श्रेणी में आता है. इस पूरे मामले ने धार्मिक परंपरा, प्रशासनिक नियम और न्यायिक आदेशों के बीच टकराव को उजागर कर दिया है, जिस पर आने वाले दिनों में और बहस होने की संभावना है.

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