अपराध गलत लेकिन...22 साल बाद युवती को मिलेगा क्षमादान, मंगेतर की हत्या के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने सुनाया फैसला

सुप्रीम कोर्ट ने जबरन विवाह के दबाव में अपराध करने वाली शुभा को राज्यपाल से क्षमादान मांगने की अनुमति दी. कोर्ट ने सुधारात्मक न्याय और पुनर्वास पर जोर दिया, साथ ही सामाजिक दबावों को अपराध के कारण के रूप में स्वीकार किया. शुभा की सजा आठ सप्ताह के लिए स्थगित की गई ताकि वह क्षमादान के लिए आवेदन कर सके.

Yaspal Singh
Edited By: Yaspal Singh

सुप्रीम कोर्ट ने एक महिला शुभा को अपने मंगेतर की हत्या के मामले में राज्यपाल से क्षमादान मांगने की अनुमति देते हुए कहा है कि जब महिलाएं सामाजिक मजबूरियों के चलते अपराध करती हैं, विशेषकर जबरन विवाह के कारण, तो उनके साथ सुधारात्मक दृष्टिकोण अपनाया जाना चाहिए. अदालत ने माना कि शुभा का अपराध उसकी इच्छा के विरुद्ध शादी करने के दबाव से प्रभावित था. व्यवस्थागत विफलताओं की भूमिका को स्वीकार किया.

जस्टिस एम.एम. सुंदरेश और जस्टिस अरविंद कुमार की पीठ ने यह स्वीकार किया कि समाज की असमानताओं, संस्थागत विफलताओं और भेदभावपूर्ण रवैये ने शुभा जैसे कई मामलों में अपराध की दिशा तय की है. पीठ का मानना है कि जब कोई व्यक्ति पूरी तरह से अपराध के लिए जिम्मेदार नहीं है, तो उस पर सुधार और पुनर्वास का दृष्टिकोण अपनाया जाना चाहिए.

22 साल पुराना मामला 

शुभा को 2003 में अपने मंगेतर की हत्या के लिए दोषी ठहराया गया था, जब वह केवल 20 वर्ष की कॉलेज छात्रा थी. उसने बार-बार अपने परिवार से शादी न करने की इच्छा जताई थी, लेकिन दबाव में आकर परिस्थितियों ने उसे एक गलत राह पर धकेल दिया. अदालत ने इस तथ्य को रेखांकित किया कि अब समाज में लैंगिक उत्पीड़न को लेकर अधिक जागरूकता है, जो उस समय नहीं थी.

न्याय में करुणा 

अदालत ने कहा कि किसी को केवल सजा देना ही पर्याप्त नहीं है, बल्कि ऐसे व्यक्तियों को समाज में पुनः शामिल करने का प्रयास होना चाहिए. विशेषकर तब, जब उनका अपराध सामाजिक दबावों का परिणाम हो. अदालत ने यह भी कहा कि जब कोई महिला अपने जीवन को लेकर निर्णय लेने में स्वतंत्र नहीं होती, तो वह अपराध की शिकार कम और पीड़िता अधिक बन जाती है.

संवैधानिक सिद्धांतों के तहत क्षमादान की अनुमति

सुप्रीम कोर्ट ने शुभा और उसके तीन साथियों – अरुण वर्मा, वेंकटेश और दिनेश – को कर्नाटक के राज्यपाल से क्षमादान मांगने की अनुमति दी. अदालत ने भारतीय संविधान के अनुच्छेद 161 का हवाला देते हुए कहा कि यह प्रावधान सजा में राहत का अवसर देता है, विशेषकर तब जब सामाजिक और व्यक्तिगत स्थितियाँ जटिल हों.

अपराध उचित नहीं, पर संवेदना जरूरी

अदालत ने स्पष्ट किया कि वह शुभा के अपराध को सही नहीं ठहराती, क्योंकि इसमें एक निर्दोष युवक की जान चली गई. लेकिन यह भी माना कि शुभा अपने जीवन के उस मोड़ पर निर्णय लेने में सक्षम नहीं थी. इसीलिए उसे पूरी तरह दोषी नहीं माना जा सकता.

सजा में अस्थायी राहत

न्यायालय ने शुभा को क्षमादान के लिए आवेदन देने का अवसर देने हेतु उसकी सजा को आठ सप्ताह के लिए स्थगित कर दिया है. यह फैसला एक उदाहरण बन गया है कि न्याय केवल दंड नहीं, बल्कि सुधार और पुनर्वास का माध्यम भी होना चाहिए.

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