अमेरिका से टेंशन के बीच भारत ने चाबहार पोर्ट के लिए बजट में नहीं किया कोई ऐलान, जानें सरकार ने क्यों उठाया ये कदम

बजट 2026-27 चाबहार बंदरगाह परियोजना के लिए कोई धनराशि आवंटित नहीं की गई है. कई सालों से भारत इस महत्वपूर्ण परियोजना के लिए हर साल करीब 100 करोड़ रुपये का प्रावधान करता आ रहा था, लेकिन इस बार इसे पूरी तरह छोड़ दिया गया.

Yaspal Singh
Edited By: Yaspal Singh

नई दिल्ली: केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने रविवार को संसद में केंद्रीय बजट 2026-27 पेश किया. इस बजट में ईरान के चाबहार बंदरगाह परियोजना के लिए कोई धनराशि आवंटित नहीं की गई है. कई सालों से भारत इस महत्वपूर्ण परियोजना के लिए हर साल करीब 100 करोड़ रुपये का प्रावधान करता आ रहा था, लेकिन इस बार इसे पूरी तरह छोड़ दिया गया. यह फैसला अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ते तनाव तथा ईरान पर अमेरिकी प्रतिबंधों की अनिश्चितता के बीच आया है.

चाबहार बंदरगाह का रणनीतिक महत्व

चाबहार बंदरगाह ईरान के दक्षिणी तट पर ओमान की खाड़ी के मुहाने पर स्थित है. यह ईरान का पहला गहरा पानी वाला बंदरगाह है, जो वैश्विक समुद्री व्यापार मार्गों से सीधी कनेक्टिविटी देता है. पाकिस्तान की सीमा के पश्चिम में स्थित यह बंदरगाह पाकिस्तान के ग्वादर बंदरगाह के ठीक सामने है, जिसे चीन ने बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव (बीआरआई) के तहत विकसित किया है. 

भारत के लिए चाबहार सिर्फ आर्थिक नहीं, बल्कि रणनीतिक महत्व का है. यह पाकिस्तान को बायपास करके अफगानिस्तान, मध्य एशिया और उससे आगे तक पहुंच का वैकल्पिक रास्ता देता है. पाकिस्तान ने लंबे समय से भारत को जमीनी रास्ते से इन क्षेत्रों में व्यापार करने से रोका है. ईरान के नजरिए से भी यह बंदरगाह पश्चिमी प्रतिबंधों से राहत दिलाने का माध्यम है.

भारत की भागीदारी का इतिहास

चाबहार में भारत की भूमिका दो दशकों से ज्यादा पुरानी है. 2002 में ईरान के तत्कालीन राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार हसन रूहानी ने भारतीय समकक्ष ब्रजेश मिश्रा से इसकी चर्चा शुरू की. 2003 में राष्ट्रपति खातमी की भारत यात्रा के दौरान तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के साथ सहयोग का रोडमैप तैयार हुआ, जिसमें चाबहार प्रमुख था. 

विभाजन के बाद पाकिस्तान के कारण भारत का ईरान और मध्य एशिया से भूमि संपर्क टूट गया. 1996 में तालिबान के अफगानिस्तान पर कब्जे के बाद भारत और ईरान का सहयोग बढ़ा. दोनों ने पाकिस्तान समर्थित मिलिशिया का विरोध किया और उत्तरी गठबंधान को सपोर्ट किया. चीन के ग्वादर विकास के बाद चाबहार भारत के लिए चीन के प्रभाव को बैलेंस करने का जरिया बन गया.

अमेरिकी प्रतिबंधों का असर

पिछले साल सितंबर में अमेरिका ने ईरान पर सख्त आर्थिक प्रतिबंध लगाए, लेकिन भारत की चाबहार भागीदारी के लिए छह महीने की छूट दी. यह छूट 26 अप्रैल 2026 को खत्म हो रही है. विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने कहा था कि भारत अमेरिका के साथ बातचीत कर रहा है. ट्रंप प्रशासन ने ईरान से व्यापार करने वाले देशों पर 25 प्रतिशत अतिरिक्त शुल्क की धमकी दी है. 

भारत और ईरान के बीच 10 साल का समझौता

ट्रंप ने पहले 2018 में छूट रद्द की थी, लेकिन बाद में भारत को छह महीने की मोहलत दी. अब तनाव बढ़ने पर भारत ने सतर्कता बरतते हुए बजट में फंडिंग रोकी है. हालांकि, 2024 में भारत और ईरान ने 10 साल का समझौता किया था, जिसमें शाहिद बेहेश्ती टर्मिनल का संचालन भारत को मिला है.

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