CJI पर जूता फेंकने वाले वकील पर कार्रवाई से SC का इनकार, क्या मामला खुद खत्म होगा?

CJI पर जूता फेंकने वाले वकील पर कार्रवाई से SC का इनकार, क्या मामला खुद खत्म होगा?

Lalit Sharma
Edited By: Lalit Sharma

National News: चीफ जस्टिस पर जूता फेंकने की पुरानी घटना को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने ताज़ा सुनवाई में सख्त संदेश की जगह संयम दिखाया। अदालत ने कहा कि ऐसी हरकतें अवमानना होती हैं, लेकिन हर मामले में सज़ा देना जरूरी नहीं। कोर्ट ने साफ किया कि बेवजह नोटिस से गलत चर्चा बढ़ती है। अदालत ने माना कि अनुशासन ज़रूरी है, पर अनावश्यक शोर नहीं। इसलिए कोर्ट ने कार्रवाई टाल कर विषय को शांति से ठंडा करने का रास्ता चुना। अदालत बोली, गरिमा loudness से नहीं बढ़ती।

क्या हर अवमानना दंडनीय?

सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि कोर्टरूम में नारे या जूता फेंकना अवमानना की परिभाषा में आता है। फिर भी अंतिम निर्णय संबंधित जज के विवेक पर रहता है। कानून सज़ा की अनुमति देता है, पर हर बार उसका प्रयोग अनिवार्य नहीं। अदालत ने कहा कि न्याय सिर्फ दंड से नहीं, संतुलन से भी चलता है। ऐसे मामलों में उत्तेजना बढ़ाने से प्रतिष्ठा नहीं बढ़ती। संयमित रुख से संस्थान की परिपक्वता दिखती है। यही न्यायपालिका की ताकत भी है।

नोटिस क्यों नहीं भेजा गया?

कोर्ट का तर्क था कि अवमानना नोटिस से आरोपी को बेवजह मंच मिल जाएगा। लोगों का ध्यान मुख्य मुद्दों से हटकर शोर-शराबे की ओर जाएगा। अदालत नहीं चाहती कि उकसावे वाली हरकतें सुर्खियां बनें। ऐसे मामलों को तूल देना गलत उदाहरण बन सकता है। इसलिए कोर्ट ने कहा कि इसे अपने आप खत्म होने दें। कभी-कभी चुप रहना ही कड़ा प्रत्युत्तर होता है। यही रणनीति इस केस में अपनाई गई।

CJI का पहले का रुख?

इससे पहले चीफ जस्टिस बीआर गवई ने स्वयं कार्रवाई से इनकार किया था। उनका संदेश था कि छोटी हरकतों से न्यायपालिका की गरिमा नहीं गिरती। अनावश्यक दंड से आरोपी को प्रतिष्ठा मिल सकती है। उन्होंने संकेत दिया कि न्यायालय बड़े मुद्दों पर ध्यान देना चाहता है। व्यक्तिगत उत्तेजना को संस्थागत प्रतिक्रिया में नहीं बदलना चाहिए। यही बात अब बेंच के रुख में भी दिखी। यह निरंतरता न्याय की गंभीरता दिखाती है।

जनता के लिए क्या सीख?

इस फैसले से जनता को समझना चाहिए कि अदालत भावनाओं नहीं, सिद्धांतों से चलती है। हर उकसावे पर कठोर दंड ही एकमात्र समाधान नहीं। व्यवस्था का लक्ष्य शांति और भरोसा बनाए रखना है। कोर्ट ने बताया कि शोहरत के लिए किए स्टंट टिकते नहीं। कानून का सम्मान शांत संस्थागत कार्रवाई से बढ़ता है। बेवजह की प्रसिद्धि रोकना भी न्याय है। यही संदेश इस मामले में केंद्र में रहा।

क्या आरोपी को नुकसान हुआ?

कार्रवाई न होने से आरोपी को लाभ नहीं मिला, बल्कि मंच छिन गया। अगर नोटिस जारी होता, तो वही व्यक्ति सुर्खियों में रहता। अब मामला धीरे-धीरे गुमनामी में चला जाएगा। कोर्ट ने अनदेखी कर उसकी ‘पब्लिसिटी रणनीति’ को निष्फल किया। यह कदम उकसावे की राजनीति को हतोत्साहित करता है। भविष्य में ऐसे स्टंट की कीमत घटती है। संस्थान की शांति बनी रहती है।

क्या सुप्रीम कोर्ट ने सही किया?

अदालत ने संकेत दिया कि मामला यहीं शांत किया जाए। गंभीर दोहराव या व्यापक अव्यवस्था पर कड़ा रुख संभव है। फिलहाल संस्थान अपनी गरिमा बचाते हुए मुख्य काम पर लौटेगा। न्यायपालिका का ध्यान बड़ी संवैधानिक और जनहित याचिकाओं पर रहेगा। छोटे उकसावे से एजेंडा नहीं बदलना चाहिए। यही परिपक्वता न्याय की रीढ़ है। और इसी से संस्थान पर भरोसा मजबूत होता है।

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