मुख्य चुनाव आयुक्त पर विपक्ष का बड़ा हमला, 200 सांसदों ने हटाने का नोटिस देकर बढ़ाया सियासी तूफान
लोकसभा स्पीकर के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव के बाद अब मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को हटाने की मांग उठी है। 200 से ज्यादा सांसदों ने नोटिस पर हस्ताक्षर कर सियासत को गरमा दिया।

देश की राजनीति में एक नया विवाद खड़ा हो गया है।मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को हटाने की मांग उठी है।सूत्रों के मुताबिक 200 से ज्यादा सांसदों ने इस प्रस्ताव पर हस्ताक्षर किए हैं।यह नोटिस संसद में पेश किया जा सकता है।विपक्ष का आरोप है कि चुनाव आयोग निष्पक्ष नहीं रहा।इसी वजह से यह कदम उठाया गया है।इस मुद्दे ने संसद की राजनीति को और गर्म कर दिया है।
कितने सांसदों ने समर्थन दिया?
सूत्रों के अनुसार लोकसभा के 130 सांसदों ने नोटिस पर साइन किए हैं।वहीं राज्यसभा के 63 सांसदों ने भी समर्थन दिया है।नियमों के अनुसार इस तरह के प्रस्ताव के लिए न्यूनतम संख्या जरूरी होती है।लोकसभा में कम से कम 100 सांसदों के हस्ताक्षर चाहिए।राज्यसभा में कम से कम 50 सांसदों का समर्थन जरूरी होता है।बताया जा रहा है कि यह संख्या आसानी से पार कर ली गई।और कई सांसदों ने बाद में भी हस्ताक्षर किए।
कौन-कौन दल हुए शामिल?
इस नोटिस को विपक्षी गठबंधन ‘इंडिया’ के सांसदों का समर्थन मिला है।सूत्रों का कहना है कि गठबंधन के सभी दलों के सांसदों ने इस पर साइन किए।इसके अलावा आम आदमी पार्टी के सांसदों ने भी हस्ताक्षर किए।हालांकि पार्टी अब आधिकारिक रूप से गठबंधन का हिस्सा नहीं है।फिर भी इस मुद्दे पर विपक्ष एकजुट दिखाई दे रहा है।इससे संसद में टकराव और बढ़ सकता है।
आरोप क्या लगाए गए हैं?
नोटिस में मुख्य चुनाव आयुक्त के खिलाफ कई गंभीर आरोप लगाए गए हैं।कहा गया है कि उन्होंने अपने पद पर रहते हुए पक्षपातपूर्ण रवैया अपनाया।उन पर चुनावी गड़बड़ियों की जांच में बाधा डालने का आरोप है।कुछ आरोप बड़े पैमाने पर मतदाताओं को मताधिकार से वंचित करने से जुड़े हैं।विपक्ष का दावा है कि चुनाव आयोग का काम निष्पक्ष होना चाहिए।लेकिन हाल के फैसलों ने सवाल खड़े कर दिए हैं।यही वजह है कि यह प्रस्ताव लाया गया है।
मतदाता सूची विवाद क्यों बढ़ा?
मतदाता सूची की विशेष गहन पुनरीक्षण प्रक्रिया को लेकर भी विवाद बढ़ा है।विपक्ष का आरोप है कि इस प्रक्रिया से सत्तारूढ़ पार्टी को फायदा पहुंचाया जा रहा है।कई नेताओं ने कहा कि इससे असली मतदाताओं के नाम हटाए जा रहे हैं।खासतौर पर पश्चिम बंगाल में इस मुद्दे पर बड़ा विवाद हुआ।मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने भी चुनाव आयोग पर सवाल उठाए हैं।उन्होंने कहा कि मतदाताओं के अधिकारों के साथ खिलवाड़ नहीं होना चाहिए।
सीईसी को हटाने की प्रक्रिया क्या?
मुख्य चुनाव आयुक्त को हटाने की प्रक्रिया बेहद सख्त होती है।इसे महाभियोग की तरह माना जाता है।यही प्रक्रिया सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट के जजों के लिए भी लागू होती है।केवल सिद्ध कदाचार या अक्षमता के आधार पर ही यह कार्रवाई हो सकती है।यह प्रस्ताव संसद के किसी भी सदन में पेश किया जा सकता है।लेकिन इसे पारित करने के लिए विशेष बहुमत जरूरी होता है।
अब आगे क्या होगा?
अब नजर इस बात पर है कि यह प्रस्ताव किस सदन में पेश होगा।अगर प्रस्ताव पेश होता है तो संसद में बड़ी बहस हो सकती है।सरकार और विपक्ष के बीच टकराव और तेज हो सकता है।इस मुद्दे ने पहले ही सियासी माहौल को गर्म कर दिया है।राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि आने वाले दिनों में यह बड़ा संवैधानिक विवाद बन सकता है।और संसद की राजनीति में नई हलचल पैदा कर सकता है।


