संघ को बीजेपी से जोड़ना गलत, लोग विकीपीड़िया से पढ़कर निकालते हैं निष्कर्ष...ऐसा क्यों बोले आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत
आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत ने कहा कि संघ को भाजपा से जोड़कर देखना गलत है. संघ अर्धसैनिक संगठन नहीं, बल्कि समाज को संगठित कर मूल्यों के विकास का मंच है. उन्होंने झूठे विमर्श को खारिज करते हुए शाखा में आकर संघ को समझने की अपील की.

नई दिल्लीः राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के सरसंघचालक मोहन भागवत ने शुक्रवार को स्पष्ट शब्दों में कहा कि संघ को भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के नजरिये से देखना या समझना एक गंभीर भूल है. उन्होंने कहा कि संघ भले ही वर्दी और शारीरिक अभ्यास करता हो, लेकिन वह किसी भी तरह से अर्धसैनिक संगठन नहीं है. भागवत ने यह बात प्रबुद्धजनों की एक सभा को संबोधित करते हुए कही, जहां उन्होंने संघ की भूमिका, उद्देश्य और उस पर बन रही धारणाओं पर खुलकर विचार रखे.
समाज को जोड़ने का कार्य करता है संघ
मोहन भागवत ने कहा कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का मूल उद्देश्य समाज को एकजुट करना और उसमें ऐसे गुणों का विकास करना है, जिससे देश भविष्य में किसी भी विदेशी शक्ति के अधीन न जाए. उन्होंने जोर देते हुए कहा कि संघ किसी राजनीतिक दल की शाखा नहीं है, बल्कि समाज को आत्मनिर्भर, संगठित और मूल्यनिष्ठ बनाने का एक माध्यम है.
संघ को बीजेपी या विद्या भारती से जोड़ना गलत
भागवत ने कहा कि अगर आप भाजपा को देखकर संघ को समझने की कोशिश करेंगे, तो यह बहुत बड़ी गलती होगी. यही गलती तब भी होगी, जब कोई विद्या भारती को देखकर संघ को परखने की कोशिश करता है. उन्होंने माना कि संघ का वैचारिक संबंध जनसंघ और बीजेपी से जोड़ा जाता रहा है, लेकिन इससे संघ के वास्तविक स्वरूप को समझना संभव नहीं है.
संघ के खिलाफ फैलाया जा रहा है झूठा विमर्श
आरएसएस प्रमुख ने कहा कि संघ को लेकर समाज में एक झूठा विमर्श खड़ा किया गया है. उन्होंने अफसोस जताया कि आज के दौर में लोग किसी विषय को गहराई से समझने की बजाय सतही जानकारी पर भरोसा कर लेते हैं. भागवत ने कहा कि आजकल लोग विकिपीडिया देखकर ही निष्कर्ष निकाल लेते हैं, जबकि वहां हर जानकारी सही नहीं होती. जो लोग भरोसेमंद स्रोतों से संघ को जानेंगे, उन्हें वास्तविकता का पता चलेगा.
किसी विरोध या प्रतिक्रिया से नहीं हुआ संघ का जन्म
संघ के शताब्दी वर्ष के दौरान देशभर के दौरे का जिक्र करते हुए भागवत ने कहा कि आम धारणा है कि संघ किसी विरोध या प्रतिक्रिया के रूप में बना, जबकि सच्चाई इससे बिल्कुल अलग है. उन्होंने स्पष्ट किया कि संघ न तो किसी के विरोध में बना और न ही वह किसी से प्रतिस्पर्धा करता है.
इतिहास से सीख लेने की जरूरत
भागवत ने भारतीय इतिहास का संदर्भ देते हुए कहा कि अंग्रेज भारत पर हमला करने वाले पहले लोग नहीं थे. उन्होंने कहा कि इतिहास में कई बार बाहरी आक्रांता आए, जो भारतीयों से संसाधनों और नैतिकता में कमजोर थे, फिर भी वे देश को पराजित करने में सफल रहे. उन्होंने सवाल उठाया कि ऐसा बार-बार क्यों हुआ और आजादी को स्थायी बनाए रखने के लिए समाज को क्या करना चाहिए.
स्वार्थ से ऊपर उठकर समाज को एकजुट होना होगा
संघ प्रमुख ने कहा कि समाज को स्वयं को समझते हुए व्यक्तिगत स्वार्थ से ऊपर उठना होगा. यदि समाज मूल्यों और सद्गुणों के साथ एकजुट होता है, तो देश का भविष्य सुरक्षित और उज्ज्वल हो सकता है. उन्होंने यह भी बताया कि संघ अब आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर है और किसी बाहरी धन या चंदे पर निर्भर नहीं है, हालांकि संगठन ने अपने शुरुआती वर्षों में कई आर्थिक कठिनाइयों का सामना किया.
संघ को समझने के लिए ‘शाखा’ में आने की अपील
अपने संबोधन के अंत में मोहन भागवत ने लोगों से अपील की कि वे संघ को समझने के लिए किसी शाखा में आएं. उन्होंने कहा कि केवल सुनने या पढ़ने से संघ को पूरी तरह समझा नहीं जा सकता. उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा, “अगर मैं दो घंटे तक बताऊं कि चीनी कितनी मीठी होती है, तब भी बात पूरी नहीं होगी. एक चम्मच चीनी चख लीजिए, खुद समझ में आ जाएगा.”


