शिंदे सेना का बड़ा दांव! MNS से गठजोड़ कर BJP को कल्याण-डोंबिवली मेयर रेस से बाहर किया

कल्यान-डोंबिवली महापालिकेत एकनाथ शिंदे की शिवसेना ने पुरानी कटुता भुलाकर राज ठाकरे की मनसे से हाथ मिलाया. यह गठबंधन सिर्फ इसलिए, ताकि भाजपा को महापौर पद न मिले. पुरानी दुश्मनी को पीछे छोड़, दोनों ने मिलकर सियासी खेल बदला और सबको चौंका दिया.

Goldi Rai
Edited By: Goldi Rai

महाराष्ट्र की राजनीति एक बार फिर चौंकाने वाले मोड़ पर खड़ी है. हाल ही में संपन्न हुए नगर निगम चुनावों ने राज्य की सियासी तस्वीर को और जटिल बना दिया है, जहां बदलते गठबंधनों ने सभी को हैरान कर दिया है. ऐसा ही नजारा कल्याण-डोंबिवली नगर निगम में देखने को मिला, जहां सत्ता की बाजी पलटने के लिए पुराने राजनीतिक विरोध भुला दिए गए.

कल्याण-डोंबिवली में एक तरफ जहां एकनाथ शिंदे के नेतृत्व वाली शिवसेना और भारतीय जनता पार्टी राज्य में महायुति सरकार का हिस्सा हैं, वहीं दूसरी ओर मेयर पद को लेकर दोनों आमने-सामने आ खड़ी हुई हैं. इस सियासी खींचतान के बीच शिंदे गुट की शिवसेना ने राज ठाकरे की महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना के साथ हाथ मिलाकर बीजेपी की राह मुश्किल कर दी है.

कल्याण-डोंबिवली में कांटे की टक्कर

122 सदस्यीय कल्याण-डोंबिवली नगर निगम चुनाव में बीजेपी ने दमदार प्रदर्शन करते हुए 50 सीटें जीतीं. यह इलाका आमतौर पर एकनाथ शिंदे का गढ़ माना जाता है. शिंदे गुट की शिवसेना को 53 सीटें मिलीं, जबकि MNS ने पांच सीटों पर जीत दर्ज की. वहीं उद्धव ठाकरे गुट की शिवसेना को 11 सीटों से संतोष करना पड़ा. KDMC में सत्ता बनाने के लिए किसी भी पार्टी या गठबंधन को 62 सीटों की जरूरत है.

शिंदे सेना और MNS का अप्रत्याशित गठबंधन

हालांकि शिवसेना और बीजेपी दोनों ही राज्य की सत्तारूढ़ महायुति में शामिल हैं, लेकिन कल्याण-डोंबिवली में मेयर पद को लेकर दोनों दलों में टकराव देखने को मिल रहा है. बुधवार को कोंकण भवन में हुई उच्चस्तरीय बैठक के बाद शिवसेना सांसद और एकनाथ शिंदे के बेटे श्रीकांत शिंदे ने MNS के साथ गठबंधन की पुष्टि की. इस गठबंधन से दोनों दलों की संयुक्त संख्या 58 तक पहुंच गई है, जो बहुमत के आंकड़े से महज चार सीट कम है.

उद्धव गुट के समर्थन पर टिकी निगाहें

बैठक के दौरान श्रीकांत शिंदे ने संकेत दिए कि उद्धव ठाकरे गुट के चार पार्षद इस गठबंधन का समर्थन कर सकते हैं. यदि ऐसा होता है तो शिंदे सेना और MNS का गठबंधन आसानी से बहुमत का आंकड़ा पार कर लेगा. इसके बाद बीजेपी के साथ किसी भी तरह के सत्ता-साझेदारी समझौते की जरूरत नहीं पड़ेगी. शिंदे गुट मेयर पद पूरे कार्यकाल के लिए अपने पास रखना चाहता है, जबकि बीजेपी ने 2.5 साल के रोटेशन फार्मूले के तहत सत्ता साझा करने की मांग की है.

पिछली बार अविभाजित शिवसेना का दबदबा

पिछले नगर निगम चुनाव में अविभाजित शिवसेना ने कल्याण-डोंबिवली में 52 सीटें जीतकर स्पष्ट बढ़त हासिल की थी. मौजूदा हालात बताते हैं कि शिवसेना के विभाजन के बाद स्थानीय राजनीति में समीकरण किस कदर बदल चुके हैं.

अन्य नगर परिषदों में भी दिखी सियासी उठापटक

इस महीने की शुरुआत में दिसंबर 2025 में हुए अंबरनाथ और अकोला नगर परिषद चुनावों में भी ऐसे ही सियासी प्रयोग देखने को मिले. अंबरनाथ में बीजेपी ने कांग्रेस के साथ गठबंधन किया, जबकि अकोला में उसने असदुद्दीन ओवैसी की AIMIM के साथ हाथ मिलाया.

हालांकि बाद में बीजेपी नेतृत्व ने इन गठबंधनों पर सख्ती दिखाई. अंबरनाथ में कांग्रेस ने अपने 12 पार्षदों को निलंबित भी कर दिया.

BMC में भी मेयर पद पर सस्पेंस 

इधर मुंबई की बृहन्मुंबई महानगरपालिका में भी मेयर पद को लेकर अनिश्चितता बनी हुई है. बीजेपी-शिंदे सेना गठबंधन ने ठाकरे परिवार के लगभग तीन दशक पुराने दबदबे को खत्म कर दिया है. 227 सदस्यीय BMC में बहुमत का आंकड़ा 114 है, जबकि महायुति ने 118 वार्डों में जीत दर्ज की है. इसके बावजूद मेयर पद पर सहमति नहीं बन पाई है.

 सियासी ड्रामा चरम

स्थिति तब और नाटकीय हो गई जब शिंदे ने नव-निर्वाचित 29 शिवसेना पार्षदों को कथित तौर पर तोड़फोड़ की आशंका के चलते एक पांच सितारा होटल में ठहराया. पार्षदों को उनके जीत प्रमाण पत्र मिलने और राजपत्र अधिसूचना जारी होने के बाद ही होटल से बाहर जाने की अनुमति दी गई. इन हाई-प्रोफाइल नगर निगम चुनावों ने महायुति के भीतर मौजूद दरारों को पूरी तरह उजागर कर दिया है.

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