Republic Day का वो दिन जब भारत ने पाकिस्तान को मुख्य अतिथि बनाकर बुलाया, लेकिन कुछ महीने बाद ही...

आज भारत 77वें गणतंत्र दिवस के रंग में रंगा है. इस खास मौके पर यूरोपीय संघ के दो टॉप लीडर एंटोनियो कोस्टा और उर्सुला वॉन डेर लेयेन, मुख्य अतिथि बनकर आए हैं. यह न सिर्फ स्वागत है, बल्कि भारत और यूरोपीय संघ के मजबूत होते रिश्तों का भी एक सुंदर प्रतीक है.

Goldi Rai
Edited By: Goldi Rai

नई दिल्ली: भारत हर वर्ष अपने गणतंत्र दिवस समारोह को कूटनीतिक मंच के रूप में भी इस्तेमाल करता रहा है. इस अवसर पर दुनिया के किसी प्रभावशाली देश के राष्ट्राध्यक्ष या शीर्ष राजनेता को मुख्य अतिथि के रूप में आमंत्रित करने की परंपरा रही है, ताकि द्विपक्षीय या बहुपक्षीय संबंधों को नई मजबूती मिल सके. हालांकि इतिहास में दो ऐसे मौके भी रहे हैं, जब भारत ने अपने सबसे करीबी पड़ोसी और आज के कट्टर प्रतिद्वंद्वी पाकिस्तान के नेताओं को गणतंत्र दिवस का मुख्य अतिथि बनाया था.

आज जब भारत 77वां गणतंत्र दिवस मना रहा है और भारत-पाकिस्तान संबंध अपने सबसे निचले स्तर पर हैं, तब यह इतिहास और भी रोचक हो जाता है. एक समय ऐसा भी था जब नई-नई आजादी के बाद भारत ने रिश्तों को सुधारने की उम्मीद में पाकिस्तान के शीर्ष नेताओं को सम्मानित मंच दिया था.

 पहली बार पाकिस्तान से मुख्य अतिथि

भारत के पांचवें गणतंत्र दिवस, यानी वर्ष 1955 में, पाकिस्तान के तत्कालीन गवर्नर जनरल मलिक गुलाम मोहम्मद को मुख्य अतिथि के रूप में आमंत्रित किया गया था. आज के तनावपूर्ण हालात को देखते हुए यह कदम असंभव-सा लगता है, लेकिन उस दौर में रिश्ते भले सहज न रहे हों, फिर भी इतनी तल्खी नहीं थी.

रिश्तों को संवारने की एक कोशिश

भारत और पाकिस्तान, दोनों ही तब नवगठित राष्ट्र थे और आंतरिक समस्याओं से जूझ रहे थे. ऐसे समय में भारत द्वारा मलिक गुलाम मोहम्मद को आमंत्रित करना एक उदार और साहसी कूटनीतिक पहल माना गया. मलिक गुलाम मोहम्मद का भारत से व्यक्तिगत जुड़ाव भी था. उन्होंने अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय से शिक्षा ली थी और हैदराबाद के निजाम के वित्तीय सलाहकार के रूप में काम किया था. भारत को उम्मीद थी कि यह व्यक्तिगत संबंध दोनों देशों के रिश्तों को सकारात्मक दिशा दे सकता है.

 आखिरी निमंत्रण और युद्ध की विडंबना

हालांकि हालात में कोई बड़ा सुधार नहीं हुआ, लेकिन भारत ने एक दशक बाद फिर उदारता दिखाई. 15वें गणतंत्र दिवस पर पाकिस्तान के तत्कालीन कृषि एवं खाद्य मंत्री राना अब्दुल हामिद मुख्य अतिथि बने. यह वर्ष 1965 था और महज तीन महीने बाद भारत-पाकिस्तान युद्ध छिड़ गया. इसके साथ ही गणतंत्र दिवस के जरिए कूटनीतिक संवाद की यह परंपरा हमेशा के लिए थम गई.

77वां गणतंत्र दिवस और बदला वैश्विक परिदृश्य

आज भारत अपने 77वें गणतंत्र दिवस पर यूरोपीय संघ के दो शीर्ष नेताओं एंटोनियो कोस्टा और उर्सुला वॉन डेर लेयेन की मेजबानी कर रहा है. भारत और यूरोपीय संघ एक महत्वपूर्ण आर्थिक समझौते के बेहद करीब हैं. इसके उलट, भारत और पाकिस्तान के रिश्ते लंबे समय से कटु दौर से गुजर रहे हैं, जो बीते इतिहास की इन घटनाओं को और भी उल्लेखनीय बना देता है.

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