हलाला के नाम पर यौन शोषण! अमरोहा केस ने मुस्लिम महिलाओं की सुरक्षा पर उठाए सवाल

अमरोहा में दर्ज हलाला मामला तलाकशुदा मुस्लिम महिलाओं पर सामाजिक और धार्मिक दबाव की भयावह तस्वीर दिखाता है. तीन तलाक कानून के बावजूद यौन शोषण, धमकी और नाबालिग विवाह जैसे गंभीर आरोपों ने कानून की सीमाएं उजागर की हैं.

Shraddha Mishra

नई दिल्ली: उत्तर प्रदेश के अमरोहा से सामने आया एक मामला सिर्फ एक आपराधिक शिकायत नहीं है, बल्कि यह उन महिलाओं की हकीकत को उजागर करता है जो तलाक के बाद भी सामाजिक और धार्मिक दबावों में फंसी रह जाती हैं. 9 दिसंबर 2025 को दर्ज की गई यह एफआईआर 2019 के तीन तलाक कानून के तहत जरूर है, लेकिन इसके आरोप कहीं ज्यादा गंभीर और चौंकाने वाले हैं. इस मामले ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि तलाक के बाद महिलाओं की सुरक्षा और अधिकारों को लेकर कानून कहां तक प्रभावी है.

अमरोहा के सैद नागली इलाके में दर्ज एफआईआर के अनुसार, एक तलाकशुदा महिला पर उसके पति, रिश्तेदारों और कुछ धार्मिक लोगों ने हलाला के लिए दबाव बनाया. महिला का आरोप है कि दोबारा शादी कराने के नाम पर उसे धमकाया गया और उसके साथ जबरन शारीरिक संबंध बनाए गए. शिकायत में यह भी कहा गया है कि हलाला की प्रक्रिया के बहाने कई बार उसका यौन शोषण हुआ. महिला ने बताया कि यह सब कुछ उसकी मर्जी के खिलाफ हुआ और उसे डर, दबाव और झूठे वादों के जरिए चुप रहने के लिए मजबूर किया गया.

पुलिस की कार्रवाई और लगाए गए आरोप

पुलिस ने इस मामले में मुस्लिम महिला (विवाह संबंधी अधिकारों का संरक्षण) अधिनियम, 2019 की धाराओं के साथ-साथ बलात्कार, गंभीर चोट, आपराधिक धमकी और साजिश से जुड़ी धाराएं लगाई हैं. शुरुआत में एफआईआर में तीन लोगों के नाम थे, लेकिन जांच के दौरान आरोपियों की संख्या बढ़ाई गई है. अब तक महिला के पति को गिरफ्तार किया जा चुका है, जबकि अन्य आरोपियों की तलाश जारी है.

नाबालिग विवाह और पॉक्सो एंगल

जांच के दौरान यह सामने आया कि महिला की शादी 2015 में तब कर दी गई थी, जब उसकी उम्र सिर्फ 15 साल थी. इसी आधार पर पुलिस ने एफआईआर में पॉक्सो एक्ट की धाराएं भी जोड़ दी हैं. यह मामला मुस्लिम पर्सनल लॉ में शादी की न्यूनतम उम्र को लेकर मौजूद कानूनी अस्पष्टता को भी उजागर करता है, जिस पर अभी तक सुप्रीम कोर्ट का अंतिम फैसला नहीं आया है.

पीड़िता, जिसका नाम बदलकर जुबैदा बताया गया है, ने कहा कि उसे दो बार तीन तलाक दिया गया और हर बार हलाला के जरिए समझौते के लिए मजबूर किया गया. उसने बताया कि वह कई साल तक अकेले अपनी बेटी की परवरिश करती रही और आर्थिक परेशानियों से जूझती रही. झूठे वादों में आकर उसने फिर भरोसा किया, लेकिन बाद में समझ आया कि उसके साथ गलत हुआ.

हलाला और कानून की स्थिति

भारतीय कानून में हलाला का कोई स्पष्ट उल्लेख नहीं है. तीन तलाक को अपराध जरूर बनाया गया है, लेकिन हलाला जैसी प्रथाओं को न तो मान्यता दी गई है और न ही इन्हें रोकने के लिए कोई ठोस नियम बनाए गए हैं. यही वजह है कि यह प्रथा अब भी छिपे तौर पर जारी है.

कार्यकर्ताओं की चिंता

महिला अधिकार कार्यकर्ताओं का कहना है कि बदनामी का डर, आर्थिक निर्भरता और बच्चों की चिंता के चलते ज्यादातर महिलाएं सामने नहीं आ पातीं. भारतीय मुस्लिम महिला आंदोलन की संस्थापक जकिया सोमन के अनुसार, हलाला का जिक्र कुरान में नहीं है और यह गलत परंपराओं और पुरुष वर्चस्व का नतीजा है. उन्होंने कहा कि तीन तलाक को अपराध बना दिया गया, लेकिन उससे जुड़ी व्यवस्थाओं पर रोक नहीं लगी.

क्यों मुश्किल है न्याय?

विशेषज्ञों के मुताबिक, मुस्लिम विवाह और तलाक का अनिवार्य पंजीकरण न होना बड़ी समस्या है. लिखित रिकॉर्ड न होने से सबूत जुटाना मुश्किल हो जाता है और पूरा बोझ महिला पर आ जाता है. कार्यकर्ताओं का कहना है कि खासकर गरीब और हाशिए पर रहने वाली महिलाएं इसका ज्यादा शिकार होती हैं. यह मामला सिर्फ एक महिला की लड़ाई नहीं है, बल्कि यह उस सिस्टम पर सवाल है, जहां कानून होने के बावजूद महिलाएं अब भी असुरक्षित हैं.

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