46 साल में बादल फटने की सिर्फ 30 घटनाएं, लेकिन पिछले 9 साल में दिखे भयानक मंजर, 8 बड़ी घटनाओं से हिला देश

भारत में हिमालयी क्षेत्रों में बादल फटने की घटनाएं तेजी से बढ़ रही हैं, जिनसे बाढ़, भूस्खलन और भारी जन-धन की हानि हो रही है. इसके पीछे जलवायु परिवर्तन, वनों की कटाई, अव्यवस्थित निर्माण, नमी का बढ़ना और हिमालय की भौगोलिक संवेदनशीलता मुख्य कारण हैं. 46 साल में बादल फटने की सिर्फ 30 घटनाएं हुईं, लेकिन पिछले 9 साल में 8 भयानक तबाहियां देखी गईं.

Yaspal Singh
Edited By: Yaspal Singh

Cloudburst: भारत में विशेष रूप से हिमालयी क्षेत्रों में बादल फटने (Cloudburst) की घटनाएं पिछले कुछ दशकों में चिंताजनक रूप से बढ़ रही हैं. ये घटनाएं सीमित क्षेत्र में अचानक भारी वर्षा लाती हैं, जिसका नतीजा यह होता है कि बाढ़, भूस्खलन और बड़े पैमाने पर जन-धन की हानि होती है. सवाल यह है कि आखिर ये आपदाएं क्यों बढ़ रही हैं और इनके पीछे कौन से कारक जिम्मेदार हैं.

क्या होता है बादल फटना?

भारतीय मौसम विभाग (IMD) के अनुसार, यदि किसी क्षेत्र में एक घंटे में 100 मिलीमीटर से अधिक वर्षा दर्ज हो और यह वर्षा 20-30 वर्ग किलोमीटर के छोटे क्षेत्र में केंद्रित हो, तो उसे बादल फटना कहते हैं. कुछ वैज्ञानिक दो घंटे में 50-100 मिलीमीटर वर्षा को "मिनी क्लाउडबर्स्ट" की श्रेणी में रखते हैं. यह घटना तब होती है जब नमी से भरी हवाएं पहाड़ों से टकराकर ऊपर उठती हैं और वहां कम्युलोनिम्बस बादल का निर्माण होता है. ये बादल अत्यधिक भारी हो जाते हैं और अचानक समूचा जल नीचे गिर पड़ता है.

बादल फटने के कारण

भौगोलिक कारण– हिमालय की ऊंची पहाड़ियां 'ओरोग्राफिक लिफ्टिंग' को बढ़ावा देती हैं, जिससे तेज वर्षा होती है. जंगलों की कटाई और अव्यवस्थित निर्माण जोखिम को और बढ़ाते हैं.

जलवायु परिवर्तन– वैश्विक तापन से समुद्र का तापमान बढ़ रहा है, जिसके कारण हवा में नमी की मात्रा अधिक हो रही है. वैज्ञानिक मानते हैं कि तापमान में 1°C बढ़ने पर हवा 7% अधिक नमी धारण कर सकती है.

मानवीय कारण– वनों की कटाई, नदियों पर बांध, और खराब जल निकासी व्यवस्था से मिट्टी पानी सोखने में असमर्थ हो जाती है, जिससे बाढ़ की स्थिति बनती है.

मॉनसून और पश्चिमी विक्षोभ– बंगाल की खाड़ी और अरब सागर से आने वाली नमी जब हिमालय से टकराती है, तो भारी वर्षा होती है. पश्चिमी विक्षोभ भी इसमें अहम भूमिका निभाते हैं.

पहचान में कठिनाई– यह घटनाएं अचानक और छोटे क्षेत्र में होती हैं, इसलिए मौसम विभाग इन्हें सटीक रूप से पूर्वानुमानित नहीं कर पाता.

बादल फटने के प्रभाव

1. बाढ़ और भूस्खलन: नदियों का उफान और पहाड़ी ढलानों का धंसना.

2. मानव क्षति: घर, सड़कें, फसलें नष्ट; सैकड़ों मौतें.

3. संचार व्यवस्था बाधित: सड़कें टूटने से राहत कार्य में देरी.

4. पर्यावरणीय नुकसान: मिट्टी का कटाव, नदियों में गाद और प्रदूषण.

5. आर्थिक प्रभाव: पर्यटन और कृषि दोनों पर भारी असर.

भारत में प्रमुख बादल फटने की घटनाएं

1908, हैदराबाद (तेलंगाना): 15,000 मौतें, 80,000 घर तबाह.

1970, अलकनंदा घाटी (उत्तराखंड): सैकड़ों मौतें, गांव नष्ट.

2005, मुंबई (महाराष्ट्र): 950 मिमी वर्षा, 1000 से अधिक मौतें.

2010, लेह (लद्दाख): 179 मौतें, हवाई अड्डा क्षतिग्रस्त.

2013, केदारनाथ (उत्तराखंड): 6000 से 10,000 मौतें, 1 लाख लोग फंसे.

2021, किश्तवाड़ (जम्मू-कश्मीर): 26 मौतें.

2022, पहलगाम (जम्मू-कश्मीर): अमरनाथ यात्रा में 15 श्रद्धालु मरे.

2025, उत्तरकाशी (उत्तराखंड): 4 मौतें, 50 लोग लापता.

2025, किश्तवाड़ (जम्मू-कश्मीर): 45 मौतें, मचैल माता यात्रा प्रभावित.

बादल फटने की बढ़ती घटनाएं, क्यों चिंता का विषय?

1. हिमालय की संवेदनशीलता: यहां के ढलान और ग्लेशियर बारिश को और तीव्र बनाते हैं.

2. जलवायु परिवर्तन का असर: 1950 के बाद से कुछ क्षेत्रों में वर्षा 20-50% अधिक दर्ज की गई.

3. मानवीय लापरवाही: अंधाधुंध पर्यटन, अवैज्ञानिक निर्माण और खराब जल निकासी.

4. पूर्वानुमान की चुनौती: केवल भारी बारिश की चेतावनी दी जा सकती है, सटीक स्थान और समय नहीं.

सबसे ज्यादा संवेदनशील क्षेत्र

जम्मू-कश्मीर: किश्तवाड़, पहलगाम, अमरनाथ.

हिमाचल प्रदेश: कुल्लू, मनाली, शिमला, चंबा.

उत्तराखंड: केदारनाथ, चमोली, रुद्रप्रयाग, जोशीमठ.

लद्दाख: लेह.

पूर्वोत्तर भारत: तवांग (अरुणाचल) और नॉर्थ सिक्किम.

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