काला कानून वापस लो...UGC रूल्स के सेक्शन 3(C) में क्या है ऐसा जिसने सवर्णों को विरोध प्रदर्शन करने पर किया मजबूर

नए एक्ट में यह बताया गया है कि कैसे शिक्षण संस्थानों में समान अवसर आयोग का गठन किया जाए. अनुसूचित जाति, जनजाति और अन्य पिछड़ा वर्ग के छात्रों से भेदभाव को रोकने की बात कही गई है. वहीं इस रूल्स के सेक्शन 3 C की बात करें तो उसमें जाति आधारित भेदभाव की परिभाषा दी गई है.

Utsav Singh
Edited By: Utsav Singh

नई दिल्ली : देशभर में UGC एक्ट 2026 को लागू कर दिया गया है. नए एक्ट को देश के सभी कॉलेजों, उच्च शिक्षण संस्थानों और विश्वविद्यालयों में लागू कर दिया गया है. इस नए एक्ट में यह बताया गया है कि कैसे शिक्षण संस्थानों में समान अवसर आयोग का गठन किया जाए. अनुसूचित जाति, जनजाति और अन्य पिछड़ा वर्ग के छात्रों से भेदभाव को रोकने की बात कही गई है. वहीं इस रूल्स के सेक्शन 3 C की बात करें तो उसमें जाति आधारित भेदभाव की परिभाषा दी गई है.

इसमें बताया गया है कि जाति-आधारित भेदभाव का अर्थ अनुसूचित जातियों, अनुसूचित जनजातियों एवं अन्य पिछड़े वर्गों के सदस्यों के विरुद्ध केवल जाति या जनजाति के आधार पर भेदभाव है. इसी को लेकर आपत्ति जताई जा रही है. 

नए एक्ट को लेकर देशभर में विरोध प्रदर्शन 
आपको बता दें कि इस पूरे मामले पर देशभर में विरोध प्रदर्शन हो रहा है. सवर्ण समाज से जुड़े संगठनों का कहना है कि UGC के नए एक्ट ने एससी, एसटी और ओबीसी को तो किसी भी तरह के भेदभाव से संरक्षण दे दिया है, लेकिन सामान्य वर्ग के छात्रों के लिए कुछ भी नहीं कहा गया है. इसके साथ ही संगठनों को इस बात पर भी आपत्ति है कि यदि शिकायत करने वाला ही गलत पाया जाता है तो उसके खिलाफ किसी भी तरह की कार्रवाई का कोई भी प्रावधान नहीं है. 

शिकायतकर्ता के खिलाफ कार्रवाई का प्रावधान नहीं

इसमे चिंता की बात तो यह है कि यदि झूठी शिकायत करने पर शिकायतकर्ता के खिलाफ ऐक्शन का कोई प्रावधान नहीं होगा तो आनेवाले समय में झूठी शिकायतों के मामले बढ़ जाएंगे और सवर्ण वर्ग को छात्रों को परेशान करने का यह एक नया उपकरण बन जाएगा. 

सेक्शन E को पढ़ना जरूरी 
UGC के नए नियम के तहत सभी शिक्षण संस्थानों को अपने-अपने संस्थान में समान अवसर केंद्र का गठन करना होगा. इसके साथ ही एक समता हेल्पलाइन का भी गठन किया जाएगा, जिस पर कभी भी कोई शिकायत कर सकता है. इसके साथ ही साथ जांच कमेटी गठित करने और यदि मामला संज्ञेय अपराध की श्रेणी में आता हो तो पुलिस तक को मामला सौंपे जाने की बात कही गई है. इसको लेकर भी आपत्ति है कि आखिर कैसे किसी भी विश्वविद्यालय के कैपसों में पुलिस की एंट्री हो सकती है.  इन पूरी बातों को गहराई तक समझने के लिए हमें सेक्शन E को पढ़ना होगा. इसमें भेदभाव की परिभाषा दी गई है. 

दरअसल, सेक्शन E में लिखा गया है कि भेदभाव का अर्थ धर्म, नस्ल, जाति, लिंग, जन्म स्थान, दिव्यांगता या इनमें से किसी एक के आधार पर किसी भी हितधारक के विरुद्ध कोई भी अनुचित या भेदभावपूर्ण व्यवहार या कोई ऐसा काम चाहे वह स्पष्ट या अंतर्निहित हो शामिल है. 

सामान्य वर्ग के छात्रों को संरक्षण क्यों नहीं ?
वहीं कुछ सवर्ण संगठनों ने इस बात की भी मांग कि है कि आखिर इस नए एक्ट के तहत सामान्य वर्ग के लोगों को भी संरक्षण क्यों नहीं दिया जा सकता है. संगठन ने इस मामले पर यह दलील दी है कि जैसे एससी, एसटी और ओबीसी के छात्र भेदभाव का शिकार हो सकते है, वैसे ही सवर्ण वर्ग के छात्र भी हो सकते हैं. ऐसे में उन्हें भी अपने खिलाफ होने वाले भेदभाव पर शिकायत करने या लड़ने का वैसा ही अधिकार मिले जैसे अन्य वर्गों के छात्रों को दिया जा रहा है. 

इसके साथ ही झूठी शिकायतों के मामले में शिकायत करने वाले के खिलाफ जुर्माना या अन्य कार्रवाई के प्रावधान की भी मांग की जा रही है. इस तरह सरकार के तरफ से जाति आधारित भेदभाव की परिभाषा को लेकर जो प्रावधान है, उस पर सवर्ण वर्ग को बड़ी आपत्ति है.  

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