फिर से सत्ता का स्वाद चखने वाली है BNP, 212 सीटों पर दर्ज की जीत!...जानें बांग्लादेश में छात्र नेताओं का क्या है हाल ?

बांग्लादेश चुनाव में बीएनपी ने दो दशक बाद सत्ता में वापसी कर शानदार जीत हासिल की है. वहीं शेख हसीना के खिलाफ आंदोलन छेड़ने वाले छात्र नेताओं की पार्टी नेशनल सिटीजन पार्टी को करारी हार का सामना करना पड़ा है.

Utsav Singh
Edited By: Utsav Singh

नई दिल्ली :  बांग्लादेश की राजनीति में एक ऐतिहासिक बदलाव की लहर देखी जा रही है. शेख हसीना के सत्ता से हटने के बाद हुए पहले चुनाव में बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (बीएनपी) ने अपने सहयोगियों के साथ मिलकर प्रचंड बहुमत प्राप्त किया है. लगभग दो दशकों के लंबे इंतजार के बाद बीएनपी फिर से देश की कमान संभालने के लिए तैयार है. हालांकि इन नतीजों में सबसे ज्यादा चर्चा उन छात्र नेताओं की विफलता की है जिन्होंने हसीना सरकार का तख्तापलट करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी.

बीएनपी की ऐतिहासिक जीत

आपको बता दें कि चुनाव के शुरुआती रुझानों और विश्वसनीय रिपोर्ट्स के अनुसार बीएनपी और उसके गठबंधन ने 212 सीटों पर कब्जा कर एक ऐतिहासिक बढ़त बना ली है. खालिदा जिया के आकस्मिक निधन के बाद उपजी भारी सहानुभूति और राजनैतिक बदलाव की लहर ने पार्टी को सत्ता की दहलीज तक बड़ी आसानी से पहुंचा दिया है. हालांकि अभी अंतिम आधिकारिक आंकड़ों की घोषणा शेष है परंतु बीएनपी ने अपनी भारी जीत का ऐलान कर दिया है. दूसरी तरफ जमात-ए-इस्लामी ने चुनावी प्रक्रिया पर सवाल उठाए हैं. 

छात्र नेताओं की करारी शिकस्त

दरअसल, अगस्त 2024 के विद्रोह के नायक रहे छात्र नेता इस बार जनता का चुनावी विश्वास जीतने में पूरी तरह असफल रहे. नाहिद इस्लाम जैसे चर्चित युवा चेहरों की नेशनल सिटीजन पार्टी (एनसीपी) का प्रदर्शन बेहद निराशाजनक रहा. एनसीपी ने 30 सीटों पर प्रत्याशी उतारे थे लेकिन वह केवल 5 सीटें ही जीत सकी. सड़कों पर सरकार गिराने वाले इन युवाओं का जोश चुनावी मैदान में फीका पड़ गया. उनकी भारी लोकप्रियता मतपेटियों तक नहीं पहुंच सकी जो बाकी पार्टियों की तुलना में काफी खराब प्रदर्शन है.

विफलता के पीछे के कारण

राजनैतिक विशेषज्ञों का मानना है कि छात्र नेताओं की सबसे बड़ी विफलता उनकी सांगठनिक मजबूती की कमी रही. वे एक एकजुट संगठन के रूप में रहने के बजाय अलग-अलग गुटों में बिखर गए जिससे उनकी शक्ति बीएनपी के विशाल नेटवर्क के सामने बहुत कमजोर साबित हुई. जैसे-जैसे चुनाव नजदीक आए देश के युवाओं ने नए प्रयोगों के बजाय स्थिरता और पुराने शासन के अनुभव को प्राथमिकता दी. युवाओं ने बीएनपी का दामन थाम लिया जिससे एनसीपी का अपना मुख्य जनाधार ही पूरी तरह से खिसक गया.

आवामी लीग के वोटर्स का रुख

रिपोर्ट्स के मुताबिक आवामी लीग के पारंपरिक मतदाताओं ने भी इस बार छात्र नेताओं के बजाय बीएनपी की तरफ अपना झुकाव दिखाया. ये मतदाता शेख हसीना की सरकार के अचानक पतन के लिए इन छात्र नेताओं को ही मुख्य रूप से जिम्मेदार मानते थे इसलिए उन्होंने नए चेहरों पर भरोसा नहीं जताया. मतदाताओं को लगा कि अशांति के इस कठिन दौर के बाद केवल बीएनपी जैसी अनुभवी पार्टी ही देश में राजनैतिक संतुलन और शांति बहाल कर सकती है. छात्र नेताओं के प्रति अविश्वास उनकी हार का कारण बना.

जमात से गठबंधन की रणनीतिक भूल

एनसीपी की हार का एक मुख्य कारण जमात-ए-इस्लामी के साथ उनका चुनावी गठबंधन भी रहा. हादी की मृत्यु के बाद एनसीपी ने जमात के साथ मिलकर लड़ने का फैसला किया जिसने प्रगतिशील मतदाताओं को नाराज कर दिया. जमात की पाकिस्तान समर्थक छवि और उसका विवादित इतिहास युवाओं को बिल्कुल रास नहीं आया. इस गठबंधन के विरोध में एनसीपी के भीतर ही फूट पड़ गई और एक बड़ा धड़ा अलग हो गया. इस रणनीतिक भूल ने छात्र नेताओं की बची-खुची राजनैतिक संभावनाओं को भी पूरी तरह खत्म कर दिया.

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