ओमान वार्ता फेल हुई तो सुलग उठेगा मिडिल ईस्ट! अमेरिका-ईरान आमने-सामने, बढ़ा युद्ध का खतरा
ओमान में अमेरिका और ईरान के बीच होने वाली अहम बैठक से पहले मिडिल ईस्ट में तनाव चरम पर पहुंच गया है. सैन्य ताकत के खुले प्रदर्शन और तीखे बयानों के बीच आशंका जताई जा रही है कि अगर बातचीत नाकाम रही तो पूरा खाड़ी क्षेत्र युद्ध की आग में झुलस सकता है.

नई दिल्ली: अमेरिका और ईरान के बीच लंबे समय से चला आ रहा तनाव अब बेहद खतरनाक मोड़ पर पहुंच चुका है. मिडिल ईस्ट में हालात लगातार बिगड़ते जा रहे हैं और ओमान में होने वाली अहम बैठक से ठीक पहले दोनों देशों की सैन्य गतिविधियों ने हालात को और विस्फोटक बना दिया है.
ओमान में प्रस्तावित बातचीत में अब कुछ ही घंटे बाकी हैं, लेकिन उससे पहले ही अमेरिका और ईरान की सेनाएं प्रत्यक्ष रूप से आमने-सामने दिखाई दे रही हैं. अमेरिकी मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, अमेरिकी लड़ाकू विमानों ने ईरान के सुप्रीम लीडर अयातुल्लाह अली खामेनेई के कथित सीक्रेट बंकर को टारगेट लॉक कर लिया है. ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यही है कि अगर यह बैठक विफल रही तो क्या राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप सैन्य कार्रवाई का आदेश दे सकते हैं?
ओमान बैठक से पहले बढ़ी सैन्य हलचल
कतर, तुर्किए और मिस्र की मध्यस्थता से आयोजित इस बैठक में ईरान के परमाणु और मिसाइल कार्यक्रमों पर चर्चा होनी है. ओमान के विदेश मंत्री बदर अल बुसैदी इस मीटिंग की मेजबानी कर रहे हैं. ईरान की ओर से अब्बास अराघची जबकि अमेरिका की तरफ से जेरेड कुशनर और स्टीव विटकॉफ शामिल होने वाले हैं.
हालांकि, बैठक से पहले ही अरब सागर में अमेरिकी सैन्य बेड़े द्वारा एक ईरानी ड्रोन को मार गिराने की घटना सामने आ चुकी है. इसे दोनों देशों द्वारा बातचीत से पहले अपनी-अपनी सैन्य ताकत और इरादों के प्रदर्शन के तौर पर देखा जा रहा है.
दोनों देशों ने दिखाया सैन्य दम
अमेरिका पहले ही मिडिल ईस्ट में अपनी सैन्य मौजूदगी बढ़ा चुका है. वहीं ईरान ने भी मिसाइल परीक्षण कर और एक नए अंडरग्राउंड मिसाइल सेंटर का खुलासा कर अपनी ताकत का संकेत दे दिया है. यह साफ दिख रहा है कि कूटनीति के साथ-साथ सैन्य विकल्प भी पूरी तरह तैयार रखे गए हैं.
'शांति की गुंजाइश बेहद कम'
सूत्रों के मुताबिक, ओमान में होने वाली इस बैठक के सफल होने की संभावना बेहद कम मानी जा रही है. इसकी सबसे बड़ी वजह अमेरिका और ईरान के एजेंडे में भारी अंतर है. अमेरिका चाहता है कि ईरान अपने परमाणु कार्यक्रम के साथ-साथ मिसाइल प्रोग्राम पर भी बातचीत करे, जबकि ईरान केवल परमाणु मुद्दे तक ही चर्चा सीमित रखना चाहता है.
अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो पहले ही संकेत दे चुके हैं कि किसी ठोस समझौते की राह आसान नहीं है. दोनों देशों का सख्त रुख यह दर्शाता है कि कूटनीति के बजाय सैन्य विकल्प ज्यादा हावी हो सकते हैं.
ईरान ने किया आर-पार का ऐलान
मीटिंग से ठीक पहले ईरान के चीफ ऑफ स्टाफ मेजर जनरल सैय्यद अब्दुलरहीम मूसावी ने अमेरिका को खुली चेतावनी दी है. ईरान ने न सिर्फ अपनी मिसाइलों का परीक्षण किया, बल्कि एक नए अंडरग्राउंड मिसाइल सेंटर का उद्घाटन भी किया.
मूसावी ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि ईरान अपने मिसाइल प्रोग्राम पर किसी भी तरह की चर्चा नहीं करेगा. उन्होंने चेतावनी दी कि दुश्मन की "एक छोटी-सी गलती" ईरान को कार्रवाई की खुली छूट दे देगी और तब "कोई भी अमेरिकी सुरक्षित नहीं रहेगा." ईरान का दावा है कि उसके पास अमेरिका और उसके सहयोगियों को "जलाने" की पूरी क्षमता मौजूद है.
खामेनेई के सलाहकार का सख्त संदेश
ईरान के सुप्रीम लीडर अयातुल्लाह अली खामेनेई के सलाहकार अली अकबर वेलायती ने भी तीखे तेवर दिखाए हैं. उन्होंने कहा कि ईरान किसी देश पर हमला करने की मंशा नहीं रखता, लेकिन अमेरिका और इजरायल जैसे विदेशी दुश्मनों के खिलाफ वह "प्रतिरोध के स्तंभ" के रूप में खड़ा है.
ईरान ने साफ कर दिया है कि वह अपनी संप्रभुता की रक्षा के लिए किसी भी हद तक जाने को तैयार है.
ट्रंप की रणनीति क्या है?
अमेरिकी रक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि डोनाल्ड ट्रंप की मौजूदा रणनीति ईरान पर अधिकतम दबाव बनाने की है, ताकि बिना सीधे युद्ध के ही उसे झुकने पर मजबूर किया जा सके. बताया जा रहा है कि ट्रंप के पास ईरान के खिलाफ एक विस्तृत सैन्य और कूटनीतिक प्लान तैयार है.
इस प्लान का अंतिम उद्देश्य केवल सैन्य कार्रवाई नहीं, बल्कि ईरान में खामेनेई सरकार के खिलाफ हालात बनाना भी हो सकता है. अमेरिका ईरान में चल रहे विरोध प्रदर्शनों का समर्थन कर आंतरिक अस्थिरता पैदा करना चाहता है. हालांकि, इस रणनीति में सबसे बड़ी बाधा ईरान की मजबूत सेना मानी जा रही है, जो पूरी तरह खामेनेई के साथ खड़ी है.
अगर ओमान की यह बैठक किसी नतीजे पर नहीं पहुंचती, तो आने वाले कुछ घंटों में खाड़ी क्षेत्र में हालात और विस्फोटक होने की आशंका से इनकार नहीं किया जा सकता.


