जल्द खत्म होने जा रही न्यू START संधि! क्या परमाणु नियंत्रण से आजाद हो जाएंगे अमेरिका-रूस?
न्यू START संधि की अवधि पूरी होने से पहले अमेरिका और रूस के बीच अबु धाबी में अहम बातचीत हुई. दोनों देश छह महीने की अंतरिम व्यवस्था पर विचार कर रहे हैं, ताकि परमाणु हथियारों पर नियंत्रण पूरी तरह खत्म न हो.

नई दिल्ली: 5 फरवरी 2026 की आधी रात को एक अहम अंतरराष्ट्रीय समझौते की समयसीमा पूरी हो रही है. अमेरिका और रूस के बीच हुआ ‘न्यू स्टार्ट’ समझौता अब कानूनी रूप से समाप्त होने की कगार पर है. यह वही संधि है जिसने पिछले कई वर्षों से दोनों देशों के परमाणु हथियारों की संख्या पर सीमा तय कर रखी थी. इसके खत्म होने की आशंका ने दुनिया के कई देशों में चिंता पैदा कर दी है, क्योंकि इसके बाद दोनों महाशक्तियों पर कोई बाध्यकारी रोक नहीं बचेगी.
हालांकि, इस बीच अबु धाबी से आई खबरों ने माहौल में थोड़ी राहत जरूर दी है. संयुक्त अरब अमीरात में रूस और यूक्रेन के बीच शांति वार्ता चल रही है. इसी दौरान अमेरिका और रूस के प्रतिनिधियों ने भी ‘न्यू स्टार्ट’ को लेकर बातचीत की है. संकेत मिल रहे हैं कि दोनों देश इस संधि को पूरी तरह खत्म होने से बचाने के लिए एक अस्थायी व्यवस्था पर सहमत हो सकते हैं.
क्या है ‘न्यू स्टार्ट’ समझौता?
साल 2010 में हस्ताक्षरित यह संधि शीत युद्ध के बाद शुरू हुई परमाणु नियंत्रण की प्रक्रिया की अहम कड़ी रही है. इसका मकसद था कि अमेरिका और रूस अपने तैनात रणनीतिक परमाणु हथियारों की संख्या सीमित रखें. इस समझौते के तहत दोनों देशों को अधिकतम 1,550 तैनात परमाणु वॉरहेड्स रखने की अनुमति है. इस संधि ने वर्षों तक दोनों देशों के बीच पारदर्शिता और संतुलन बनाए रखने में मदद की. निरीक्षण की व्यवस्था भी इसका हिस्सा थी, जिससे दोनों पक्ष एक-दूसरे की परमाणु गतिविधियों पर नजर रख सकते थे.
संधि खत्म होने का खतरा
अगर यह समझौता बिना किसी नई व्यवस्था के समाप्त हो जाता है, तो पहली बार ऐसा होगा कि दुनिया की दो सबसे बड़ी परमाणु शक्तियों के हथियारों पर कोई कानूनी सीमा नहीं रहेगी. विशेषज्ञों का मानना है कि ऐसी स्थिति में अविश्वास बढ़ सकता है और दोनों देशों के बीच हथियारों की नई दौड़ शुरू हो सकती है. इससे वैश्विक सुरक्षा पर गंभीर असर पड़ सकता है.
मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, अमेरिका और रूस छह महीने की एक अस्थायी व्यवस्था पर विचार कर रहे हैं. इस प्रस्ताव के तहत दोनों देश फिलहाल मौजूदा सीमाओं का स्वेच्छा से पालन करेंगे. हालांकि यह कोई स्थायी समाधान नहीं होगा. अमेरिकी कानून के मुताबिक किसी भी औपचारिक विस्तार के लिए सीनेट की मंजूरी जरूरी है. इसलिए फिलहाल जो भी सहमति बनेगी, वह अनौपचारिक और सीमित अवधि के लिए होगी.
सबसे बड़ी चुनौती: भरोसा और जांच
‘न्यू स्टार्ट’ का सबसे अहम हिस्सा था निरीक्षण की व्यवस्था. इसके तहत दोनों देश एक-दूसरे के परमाणु ठिकानों की जांच कर सकते थे. लेकिन अगर नई व्यवस्था सिर्फ अस्थायी और अनौपचारिक होगी, तो संभव है कि ऑन-साइट निरीक्षण की सुविधा न मिले. ऐसे में पूरा समझौता आपसी भरोसे पर निर्भर करेगा, जो मौजूदा वैश्विक हालात में एक कठिन चुनौती है.
इस समय पूरी दुनिया की नजरें अमेरिका और रूस पर टिकी हैं. क्या दोनों देश परमाणु नियंत्रण को बनाए रखने के लिए आगे बढ़ेंगे या फिर एक नए अनिश्चित दौर की शुरुआत होगी? आने वाले दिन वैश्विक सुरक्षा की दिशा तय कर सकते हैं.


