एक तरफ ब्रह्मोस की दहाड़, दूसरी तरफ JF-17 की फरियाद, पाकिस्तान अब क्या नया ड्रामा रच रहा है?

पिछले साल मई में जब भारत-पाकिस्तान के बीच तनाव चरम पर पहुंचा, तब से ब्रह्मोस मिसाइल भारत की सैन्य रणनीति का सबसे बड़ा हथियार बन गई. ऑपरेशन सिंदूर के तहत भारतीय वायुसेना ने Su-30MKI फाइटर जेट्स से करीब 15 ब्रह्मोस सुपरसोनिक मिसाइलें दागीं थी.

Goldi Rai
Edited By: Goldi Rai

नई दिल्ली: भारत और इंडोनेशिया के बीच रक्षा सहयोग जिस अहम चरण में पहुंच चुका है, उसी दौरान एक नई रणनीतिक उलझन सामने आ गई है. इंडोनेशिया के रक्षा मंत्री साफरी समसुद्दीन की हालिया पाकिस्तान यात्रा और वहां पाकिस्तानी वायुसेना प्रमुख एयर चीफ मार्शल जहीर अहमद बाबर सिद्धू से हुई मुलाकात के बाद यह संकेत मिले हैं कि इंडोनेशिया पाकिस्तान से लड़ाकू विमानों की खरीद पर गंभीरता से विचार कर रहा है.

यह घटनाक्रम ऐसे समय पर सामने आया है जब भारत और इंडोनेशिया लगभग 450 मिलियन डॉलर की ब्रह्मोस सुपरसोनिक क्रूज मिसाइल डील को अंतिम रूप देने के बेहद करीब हैं. रिपोर्ट्स के मुताबिक, इंडोनेशिया पाकिस्तान-चीन के संयुक्त रूप से विकसित JF-17 ‘थंडर’ मल्टी-रोल फाइटर जेट्स को अपने बेड़े में शामिल करने की संभावना तलाश रहा है.

पाकिस्तान का प्रस्ताव

पाकिस्तान ने कथित तौर पर इंडोनेशिया को 40 तक JF-17 लड़ाकू विमान देने का प्रस्ताव रखा है. JF-17 एक ऐसा फाइटर जेट है जिसे पाकिस्तान और चीन ने मिलकर विकसित किया है. भारत के लिए यह स्थिति इसलिए संवेदनशील मानी जा रही है, क्योंकि नई दिल्ली इंडोनेशिया को दक्षिण चीन सागर में चीन की बढ़ती सैन्य आक्रामकता के खिलाफ एक महत्वपूर्ण रणनीतिक साझेदार के रूप में देखता है.

ऐसे में जकार्ता का इस्लामाबाद और बीजिंग से जुड़े रक्षा प्लेटफॉर्म्स के साथ बढ़ता सैन्य सहयोग भारत के लिए चिंता का कारण बनता जा रहा है. उल्लेखनीय है कि इंडोनेशिया दुनिया का सबसे बड़ा मुस्लिम बहुल देश है.

कॉम्बैट ड्रोन पर भी विचार

भारत की चिंताएं तब और बढ़ गईं जब यह जानकारी सामने आई कि इंडोनेशिया पाकिस्तान में बने कॉम्बैट ड्रोन खरीदने पर भी विचार कर रहा है. इसी कड़ी में बांग्लादेश वायुसेना द्वारा भी पाकिस्तान के साथ रक्षा सहयोग बढ़ाने और JF-17 विमानों की संभावित खरीद को लेकर बातचीत की खबरें सामने आई हैं.

रणनीतिक विशेषज्ञों के अनुसार, यह सब पाकिस्तान की उस व्यापक रणनीति का हिस्सा है, जिसके तहत वह चीन समर्थित हथियार प्रणालियों को क्षेत्र में आक्रामक रूप से आगे बढ़ा रहा है.

जब ब्रह्मोस बनी भारत की ताकत

भारत की सैन्य रणनीति में ब्रह्मोस मिसाइल की अहम भूमिका उस समय साफ नजर आई थी, जब पिछले वर्ष मई में भारत-पाकिस्तान के बीच तनाव चरम पर पहुंच गया था. ऑपरेशन सिंदूर के तहत 9-10 मई की रात भारतीय वायुसेना ने Su-30MKI लड़ाकू विमानों से लगभग 15 ब्रह्मोस मिसाइलें दागी थीं.

इन हमलों में पाकिस्तान के 12 प्रमुख एयरबेस में से 11 को भारी नुकसान पहुंचा था. प्रभावित ठिकानों में चकलाला (नूर खान), रफीकी, सरगोधा, जैकोबाबाद, भोलारी और स्कार्दू शामिल थे.

मैक-3 की रफ्तार और मारक क्षमता

करीब 300 किलोमीटर रेंज और मैक-3 से अधिक गति वाली ये रामजेट संचालित ‘फायर एंड फॉरगेट’ मिसाइलें पाकिस्तानी, विशेष रूप से चीनी मूल की वायु रक्षा प्रणालियों को चकमा देने में सफल रहीं. इन हमलों में रडार स्टेशन, कमांड सेंटर, गोला-बारूद डिपो और रनवे तबाह हो गए, जिससे पाकिस्तान की जवाबी हवाई कार्रवाई की क्षमता लगभग खत्म हो गई.

बाद में पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने भी स्वीकार किया था कि ये हमले उनकी नियोजित प्रतिक्रिया से ठीक पहले हुए और सेना पूरी तरह चौंक गई.

ब्रह्मोस डील बनाम JF-17: भरोसे की परीक्षा

रणनीतिक जानकारों का मानना है कि इंडोनेशिया द्वारा पाकिस्तान के JF-17 विमानों पर विचार करना, भारत-इंडोनेशिया के बीच आपसी विश्वास को कमजोर कर सकता है और क्षेत्रीय सुरक्षा संतुलन को और जटिल बना सकता है. यह खास तौर पर तब अहम हो जाता है, जब दोनों देश ब्रह्मोस जैसी अत्यंत संवेदनशील और भरोसे पर आधारित डील के बेहद करीब हों.

ब्रह्मोस डील की पृष्ठभूमि और रूस की भूमिका

पिछले नवंबर में हुई तीसरी भारत-इंडोनेशिया रक्षा मंत्रियों की बैठक में, भारतीय रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह और इंडोनेशिया के रक्षा मंत्री के बीच ब्रह्मोस डील को लेकर महत्वपूर्ण प्रगति हुई थी. इस समझौते के तहत इंडोनेशिया, फिलीपींस के बाद दूसरा दक्षिण-पूर्व एशियाई देश बन सकता है जो ब्रह्मोस मिसाइल हासिल करेगा.

भारत और इंडोनेशिया के बीच बातचीत लगभग पूरी हो चुकी है और अब केवल रूस की औपचारिक मंजूरी शेष है, क्योंकि ब्रह्मोस एयरोस्पेस में रूस की 49.5 प्रतिशत हिस्सेदारी है. यह संयुक्त उद्यम भारत की DRDO और रूस की एनपीओ माशिनोस्ट्रोएनिया के बीच है, जिसमें भारत की नियंत्रक हिस्सेदारी 50.5 प्रतिशत है.

नातुना सागर और इंडोनेशिया की समुद्री सुरक्षा

ब्रह्मोस डील पर उस समय भी चर्चा हुई थी, जब इंडोनेशिया के राष्ट्रपति प्रबोवो सुबियांतो वर्ष 2025 के गणतंत्र दिवस पर भारत के मुख्य अतिथि के रूप में नई दिल्ली आए थे. इंडोनेशिया की ब्रह्मोस में रुचि उसकी समुद्री सुरक्षा जरूरतों, खासकर नातुना सागर क्षेत्र में बढ़ते दबाव से जुड़ी है.

विशेषज्ञों का मानना है कि ब्रह्मोस की तैनाती से इंडोनेशिया की समुद्री प्रतिरोधक क्षमता में बड़ा इजाफा होगा और उसकी सैन्य आधुनिकीकरण योजनाओं को मजबूती मिलेगी. इससे पहले 2022 में फिलीपींस ने 375 मिलियन डॉलर की डील के तहत ब्रह्मोस मिसाइलें खरीदी थीं, जिससे उसे दक्षिण चीन सागर में महत्वपूर्ण रणनीतिक बढ़त मिली थी.

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