पाकिस्तान में फिर गूंजा विभाजन का मुद्दा, छोटे प्रांतों के प्रस्ताव ने बढ़ाई सियासी हलचल
अलीम खान का कहना है कि पंजाब, सिंध, बलूचिस्तान और खैबर पख्तूनख्वा को तीन-चार हिस्सों में बांटा जाएगा. इससे पाकिस्तान में मौजूदा 4 प्रांतों की जगह 12 से 16 नए प्रांत बन सकते हैं.

नई दिल्ली: पाकिस्तान में एक बार फिर विभाजन शब्द ने राजनीतिक और प्रशासनिक गलियारों में हलचल मचा दी है. वर्ष 1971 में पूर्वी पाकिस्तान के अलग होकर बांग्लादेश बनने के बाद अब मौजूदा सरकार प्रशासनिक सुधारों के नाम पर देश को छोटे-छोटे प्रांतों में बांटने की तैयारी कर रही है. सरकार का दावा है कि इससे शासन व्यवस्था मजबूत होगी और विकास की रफ्तार तेज होगी.
हालांकि, विशेषज्ञ और कई राजनीतिक दल इस प्रस्ताव को पाकिस्तान के लिए खतरनाक मान रहे हैं. उनका कहना है कि यह कदम प्रशासनिक समस्याओं का समाधान करने के बजाय देश को नई राजनीतिक और क्षेत्रीय चुनौतियों की ओर धकेल सकता है, खासकर तब जब पहले से ही कई प्रांतों में असंतोष और अलगाववादी भावनाएं मौजूद हैं.
छोटे प्रांतों की वकालत, सरकार का बड़ा दांव
पाकिस्तान के संघीय संचार मंत्री और इस्तेहकाम-ए-पाकिस्तान पार्टी के अध्यक्ष अब्दुल अलीम खान ने हाल ही में देश में छोटे प्रांत बनाने की खुलकर पैरवी की है. उन्होंने जनता से वादा किया है कि प्रशासनिक इकाइयों के बंटवारे से शासन व्यवस्था अधिक प्रभावी होगी और आम लोगों तक सरकारी सेवाएं सीधे पहुंचेंगी.
क्या है विभाजन का पूरा प्लान?
अब्दुल अलीम खान के अनुसार, पाकिस्तान के चार मौजूदा प्रांत पंजाब, सिंध, बलूचिस्तान और खैबर पख्तूनख्वा को तीन या चार नई प्रशासनिक इकाइयों में विभाजित किया जाएगा. इस तरह देश में कुल 12 से 16 प्रांत बनाए जाने की संभावना है. सरकार का तर्क है कि वर्तमान प्रांत आबादी और क्षेत्रफल के लिहाज से बहुत बड़े हैं, जिसके कारण दूर-दराज के इलाकों तक विकास नहीं पहुंच पाता.
समर्थन और विरोध में बंटी सियासत
इस प्रस्ताव ने पाकिस्तान की गठबंधन सरकार के भीतर भी मतभेद उजागर कर दिए हैं. प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ की सरकार में शामिल IPP और सिंध आधारित MQM-P इस योजना के पक्ष में हैं. MQM-P ने तो नए प्रांतों के गठन के लिए 28वें संविधान संशोधन के जरिए दबाव बनाने की बात भी कही है.
वहीं, बिलावल भुट्टो जरदारी के नेतृत्व वाली पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी इस प्रस्ताव का कड़ा विरोध कर रही है. सिंध के मुख्यमंत्री मुराद अली शाह ने साफ कहा है कि वे सिंध के किसी भी प्रकार के बंटवारे को स्वीकार नहीं करेंगे. बलूचिस्तान और खैबर पख्तूनख्वा के राष्ट्रवादी संगठनों का मानना है कि यह उनकी सांस्कृतिक पहचान को कमजोर करने की साजिश है.
समाधान से ज्यादा संकट की आशंका
राजनीतिक और प्रशासनिक विशेषज्ञों ने छोटे प्रांतों की योजना को जोखिम भरा बताया है. पूर्व पुलिस प्रमुख सैयद अख्तर अली शाह का कहना है कि पाकिस्तान की असली समस्या प्रांतों की संख्या नहीं, बल्कि कमजोर संस्थाएं और जवाबदेही की कमी है. उनके अनुसार, बिना बुनियादी सुधारों के नए प्रांत बनाना अराजकता को बढ़ावा देगा.
वहीं पीआईएलडीएटी के प्रमुख अहमद बिलाल महबूब ने चेतावनी दी है कि नए प्रांतों का गठन एक महंगा और जटिल प्रक्रिया है. अतीत में भी ऐसे प्रयोगों से जनता की शिकायतें कम होने के बजाय और गहरी हुई हैं.
इतिहास और मौजूदा हालात का डर
1947 में आजादी के समय पाकिस्तान में कुल पांच प्रांत थे पूर्वी बंगाल, पश्चिम पंजाब, सिंध, नॉर्थ वेस्ट फ्रंटियर प्रोविंस और बलूचिस्तान. 1971 के युद्ध के बाद पूर्वी बंगाल अलग होकर बांग्लादेश बन गया. विशेषज्ञों को आशंका है कि बलूचिस्तान और खैबर पख्तूनख्वा में पहले से जारी अलगाववादी आंदोलनों के बीच प्रांतों का बंटवारा आग में घी डालने जैसा साबित हो सकता है.


