ट्रंप के टैरिफ से विदेशी नहीं, अमेरिकियों को ही हो रहा नुकसान... US की जनता ने ही भरा 90% बोझ
नई रिपोर्ट में दावा किया गया है कि डोनाल्ड ट्रंप की टैरिफ नीति का करीब 90% बोझ अमेरिकी उपभोक्ताओं और कारोबारियों ने उठाया. बढ़ी कीमतों के कारण हर परिवार पर अतिरिक्त आर्थिक दबाव पड़ा.

नई दिल्ली: अमेरिका की ‘अमेरिका फर्स्ट’ व्यापार नीति को लेकर एक नई रिपोर्ट ने बहस छेड़ दी है. पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने जिस टैरिफ नीति को विदेशी कंपनियों पर सख्ती बताकर पेश किया था, अब उसी पर सवाल उठ रहे हैं. ताजा अध्ययन में दावा किया गया है कि आयात शुल्क का बड़ा हिस्सा विदेशी देशों ने नहीं, बल्कि अमेरिकी उपभोक्ताओं और कारोबारियों ने ही चुकाया. यह विश्लेषण फेडरल रिजर्व बैंक ऑफ न्यूयार्क से जुड़े अर्थशास्त्रियों ने किया है.
रिपोर्ट के अनुसार, आयात पर लगाए गए टैरिफ का लगभग 90 प्रतिशत बोझ घरेलू स्तर पर पड़ा. यानी जिन शुल्कों को विदेशों पर आर्थिक दबाव बनाने के लिए लगाया गया था, उनका असर अमेरिका के भीतर ही ज्यादा महसूस किया गया. यूएसए टुडे में प्रकाशित जानकारी के मुताबिक, 6 फरवरी को जारी टैक्स फाउंडेशन की रिपोर्ट बताती है कि 2025 में हर अमेरिकी परिवार पर औसतन 1000 डॉलर का अतिरिक्त बोझ पड़ा. अनुमान है कि 2026 तक यह राशि बढ़कर 1300 डॉलर हो सकती है.
उपभोक्ताओं और कारोबारियों पर सीधा असर
रिपोर्ट में कहा गया है कि चीन सहित कई देशों से आने वाले उत्पादों पर भारी शुल्क लगाए गए थे. उस समय यह कहा गया था कि विदेशी कंपनियां ही इसकी कीमत चुकाएंगी. लेकिन वास्तविकता अलग निकली. आयात करने वाली अमेरिकी कंपनियों ने यह अतिरिक्त लागत खुद वहन की और बाद में उसी को बढ़ी हुई कीमतों के रूप में ग्राहकों तक पहुंचा दिया. इसका मतलब यह हुआ कि टैरिफ ने एक तरह से घरेलू टैक्स का रूप ले लिया. रोजमर्रा के सामान से लेकर औद्योगिक उत्पादों तक की कीमतों में बढ़ोतरी देखने को मिली, जिससे आम लोगों की जेब पर असर पड़ा.
विदेशी कंपनियों ने दाम क्यों नहीं घटाए?
रिपोर्ट में यह भी सामने आया कि विदेशी निर्यातकों ने अपने उत्पादों की कीमतों में बहुत कम कटौती की. वे टैरिफ का बोझ खुद उठाने के बजाय अमेरिकी आयातकों पर डालने में सफल रहे. नतीजतन, अमेरिकी बाजार में आयातित वस्तुएं महंगी होती चली गईं.
महंगाई पर पड़ा असर
जब कंपनियों की लागत बढ़ती है, तो वे अपने उत्पादों और सेवाओं की कीमतें बढ़ाती हैं. यही कारण है कि इस नीति का असर महंगाई पर भी पड़ा. अर्थशास्त्रियों का कहना है कि संरक्षणवादी कदम अक्सर घरेलू उद्योगों की रक्षा के नाम पर उठाए जाते हैं, लेकिन यदि उनका बोझ अंततः उपभोक्ताओं पर पड़े तो उनके फायदे सीमित हो सकते हैं.
विशेषज्ञ मानते हैं कि व्यापार नीति बनाते समय उसके दीर्घकालिक और व्यापक आर्थिक प्रभावों पर गंभीरता से विचार करना जरूरी है. यदि टैरिफ का भार मुख्य रूप से देश के भीतर ही पड़ता है, तो इससे उपभोक्ता खर्च, निवेश और प्रतिस्पर्धा पर नकारात्मक असर हो सकता है.


