नाटो सिर्फ एक कागजी संगठन...क्या US के बिना नहीं चल पाएगा यूरोप, 10 % टैरिफ के बाद अब क्या होगा ?
ग्रीनलैंड पर कब्जा करन के लिए डोनाल्ड ट्रंप किसी भी हद तक जा सकते हैं. बीते दिन ही ट्रंप ने 8 यूरोपीय देशों पर 10 फीसदी टैरिफ लगा दिया है. हैरान करने वाली बात तो यह है कि यूरोप आज के समय में पूरी तरह से अमेरिका पर निर्भर है. अमेरिका ने जिन 8 देशों पर टैरिफ लगाया है वे सभी नाटो के भी हिस्सा है.

नई दिल्ली : अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा यूरोप के कई सहयोगी देशों पर टैरिफ लगाए जाने के बाद एक बार फिर ट्रांस-अटलांटिक रिश्तों पर सवाल खड़े हो गए हैं. ग्रीनलैंड को लेकर अपनी रणनीतिक सोच के बीच ट्रंप ने नाटो के सदस्य आठ यूरोपीय देशों पर 10 प्रतिशत टैरिफ लगाने का ऐलान किया. इसके साथ ही उन्होंने यह बयान भी दिया कि अमेरिका दशकों से डेनमार्क सहित पूरे यूरोप की सुरक्षा करता आ रहा है, बिना किसी प्रत्यक्ष कीमत के. अब, उनके शब्दों में, “कर्ज चुकाने का समय आ गया है.”
सुरक्षा व्यवस्था में अमेरिका की भूमिका
परमाणु सुरक्षा भी US, ब्रिटेन और फ्रांस पर निर्भर
परमाणु सुरक्षा की बात करें तो यूरोप का न्यूक्लियर डिटरेंस भी मुख्य रूप से अमेरिका, ब्रिटेन और फ्रांस पर निर्भर है. रूस जैसे आक्रामक और सैन्य रूप से मजबूत देश के सामने अकेले यूरोपीय देशों की सामूहिक तैयारी अभी भी सीमित है. अगर अमेरिका नाटो से अपनी भूमिका कम कर दे, तो यह संगठन व्यावहारिक रूप से एक औपचारिक मंच भर बनकर रह सकता है.
हथियार और आधुनिक सैन्य तकनीक में निर्भरता
यूरोप के पास सैनिकों की संख्या, टैंक और पारंपरिक हथियारों की कमी नहीं है, लेकिन आधुनिक युद्ध केवल संख्या से नहीं जीते जाते. एयर डॉमिनेंस, ड्रोन वॉरफेयर, लॉन्ग-रेंज मिसाइल सिस्टम और ग्लोबल मिलिट्री सप्लाई नेटवर्क जैसे क्षेत्रों में यूरोप अभी भी अमेरिका पर निर्भर है.
यूरोप, अमेरिका के बिना अधूरा
यूक्रेन युद्ध ने इस सच्चाई को और उजागर किया. हथियारों की आपूर्ति, खुफिया जानकारी और उन्नत सैन्य तकनीक के लिए यूरोपीय देशों को बार-बार अमेरिका की ओर देखना पड़ा. इससे साफ होता है कि यूरोप की सैन्य ताकत अब भी अमेरिकी सहयोग के बिना अधूरी है.
आर्थिक ताकत का असंतुलन
आर्थिक स्तर पर भी अमेरिका और यूरोप के बीच बड़ा अंतर है. 2025 के अनुमान के अनुसार, पूरे यूरोप की संयुक्त अर्थव्यवस्था लगभग 20 ट्रिलियन डॉलर की है, जबकि अकेले अमेरिका की अर्थव्यवस्था 30 ट्रिलियन डॉलर से अधिक है. यह अंतर केवल आंकड़ों तक सीमित नहीं है, बल्कि वैश्विक प्रभाव और निर्णय लेने की क्षमता में भी झलकता है.
इसके अलावा, अधिकांश यूरोपीय देश अपने सकल घरेलू उत्पाद का 2 प्रतिशत भी रक्षा पर खर्च नहीं करते. अगर अमेरिका सुरक्षा की जिम्मेदारी कम करता है, तो यूरोप को अपना रक्षा बजट दो से तीन गुना तक बढ़ाना पड़ेगा. इसका सीधा असर टैक्स बढ़ने और सामाजिक कल्याण योजनाओं में कटौती के रूप में सामने आएगा, जो यूरोपीय राजनीति के लिए बेहद संवेदनशील मुद्दा है.
ऊर्जा और सप्लाई चेन में बढ़ती अमेरिकी भूमिका
रूस पर लगाए गए प्रतिबंधों के बाद यूरोप की ऊर्जा नीति पूरी तरह बदल गई है. आज यूरोप, विशेष रूप से लिक्विफाइड नेचुरल गैस के मामले में, अमेरिका पर काफी हद तक निर्भर हो चुका है. जर्मनी, फ्रांस, नीदरलैंड और इटली जैसे देशों ने नए एलएनजी टर्मिनल बनाए हैं, जिनके जरिए बड़ी मात्रा में अमेरिकी गैस आयात की जा रही है.
कच्चे तेल के क्षेत्र में भी अमेरिका यूरोप के लिए एक अहम सप्लायर बन चुका है. अमेरिका से यूरोप को होने वाला क्रूड ऑयल निर्यात रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गया है. इसके साथ ही सेमीकंडक्टर और हाईटेक चिप्स की सप्लाई में भी यूरोप अमेरिकी कंपनियों पर निर्भर है, खासकर रक्षा, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, सैटेलाइट और मिसाइल सिस्टम जैसे संवेदनशील क्षेत्रों में.
क्या यूरोप आत्मनिर्भर बन सकता है?
विशेषज्ञ मानते हैं कि यूरोप के लिए अमेरिका पर निर्भरता कम करना संभव है, लेकिन यह न तो आसान है और न ही जल्दी होने वाला है. इसके लिए कम से कम 15 से 20 साल का समय लग सकता है. यूरोप को एक संयुक्त यूरोपीय सेना की दिशा में गंभीर कदम उठाने होंगे, अपने रक्षा उद्योग में बड़े पैमाने पर निवेश करना होगा और तकनीकी क्षेत्र में अमेरिकी निर्भरता घटानी होगी.
इस प्रक्रिया में जर्मनी और फ्रांस जैसे देशों को नेतृत्वकारी भूमिका निभानी होगी. हालांकि, जब तक ये बदलाव जमीनी स्तर पर नहीं होते, तब तक ट्रंप जैसे अमेरिकी नेताओं के दबाव और फैसलों के सामने यूरोप की स्थिति कमजोर बनी रह सकती है.


