Makar Sankranti 2026: खिचड़ी से पोंगल तक, जानें कैसे पूरे भारत को एक सूत्र में जोड़ती है मकर संक्रांति

मकर संक्रांति भारत में अलग-अलग नामों और परंपराओं के साथ मनाई जाती है, लेकिन इसका मूल भाव एक ही है. यह पर्व सूर्य, फसल, प्रकृति और सामाजिक एकता के प्रति आभार व्यक्त करने का प्रतीक है.

Shraddha Mishra

भारत को त्योहारों का देश कहा जाता है, क्योंकि यहां हर पर्व सिर्फ एक तारीख नहीं होता, बल्कि वह संस्कृति, परंपरा, आस्था और सामूहिक खुशियों का प्रतीक होता है. मकर संक्रांति ऐसा ही एक महत्वपूर्ण पर्व है, जो देश के लगभग हर हिस्से में मनाया जाता है. हालांकि इस पर्व का नाम, मनाने का तरीका और परंपराएं अलग-अलग क्षेत्रों में भिन्न हैं, लेकिन इसका मूल भाव हर जगह एक ही रहता है. सूर्य के मकर राशि में प्रवेश से जुड़ा यह पर्व कृषि, मौसम के बदलाव और सामाजिक एकता का प्रतीक माना जाता है.

हिंदू पंचांग के अनुसार मकर संक्रांति उस दिन होती है, जब सूर्य धनु राशि से निकलकर मकर राशि में प्रवेश करते हैं। यह पर्व आमतौर पर 14 या 15 जनवरी को मनाया जाता है. इस दिन से उत्तरायण की शुरुआत मानी जाती है, यानी दिन लंबे और रातें छोटी होने लगती हैं. कृषि पर आधारित समाज के लिए यह समय नई फसल के आगमन और प्रकृति के प्रति धन्यवाद प्रकट करने का अवसर होता है.

इस अवसर पर देशभर के तीर्थ स्थलों पर श्रद्धालुओं की भीड़ उमड़ती है. प्रयागराज में माघ मेले के दौरान लाखों लोग कल्पवास करते हैं, जिसमें मकर संक्रांति का स्नान एक प्रमुख आयोजन होता है. इस वर्ष प्रयागराज में माघ उत्सव की शुरुआत 3 जनवरी से हुई है, जिसमें 14 जनवरी को मकर संक्रांति, 18 जनवरी को मौनी अमावस्या, 23 जनवरी को वसंत पंचमी, 1 फरवरी को माघी पूर्णिमा और 15 फरवरी को महाशिवरात्रि मनाई जाएगी.

उत्तर भारत में मकर संक्रांति के विविध रूप

उत्तर प्रदेश और बिहार में मकर संक्रांति को ‘खिचड़ी’ कहा जाता है. इस दिन चावल और दाल से बनी खिचड़ी का भोग लगाया जाता है और जरूरतमंदों को दान दिया जाता है. गंगा, सरयू और अन्य पवित्र नदियों में स्नान को शुभ माना जाता है. प्रयागराज, वाराणसी और हरिद्वार जैसे शहरों में भारी संख्या में श्रद्धालु पहुंचते हैं. उत्तराखंड में इसे ‘उत्तरायणी’ और ‘घुघुतिया’ के नाम से जाना जाता है, जबकि हिमाचल प्रदेश में यह पर्व ‘माघ साजी’ कहलाता है. मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, राजस्थान, दिल्ली और जम्मू समेत कई अन्य राज्यों में भी खिचड़ी और स्नान-दान की परंपरा प्रचलित है.

पंजाब और हरियाणा में लोहड़ी का उत्सव

पंजाब, हरियाणा और चंडीगढ़ में मकर संक्रांति से एक दिन पहले लोहड़ी मनाई जाती है. यह अग्नि और फसल से जुड़ा पर्व है. लोग अलाव जलाकर उसमें तिल, मूंगफली और रेवड़ी अर्पित करते हैं. ढोल की थाप पर भांगड़ा और गिद्दा किया जाता है. नवविवाहित जोड़ों और नवजात शिशुओं के लिए लोहड़ी विशेष महत्व रखती है.

पश्चिम भारत की रंगीन परंपराएं

गुजरात में मकर संक्रांति को ‘उत्तरायण’ कहा जाता है और यह पतंग उत्सव के लिए प्रसिद्ध है. छतों पर लोग रंग-बिरंगी पतंगें उड़ाते हैं और पूरा आसमान उत्सव में डूब जाता है. तिल, गुड़ और मूंगफली से बने व्यंजन घर-घर बनाए जाते हैं. महाराष्ट्र में इस पर्व को मकर संक्रांत कहा जाता है, जहां तिल-गुड़ बांटकर आपसी रिश्तों में मिठास घोलने की परंपरा है.

दक्षिण भारत में पोंगल और संक्रांति

तमिलनाडु में मकर संक्रांति चार दिन तक चलने वाले ‘पोंगल’ पर्व के रूप में मनाई जाती है. भोगी पोंगल, सूर्य पोंगल, मट्टू पोंगल और कानुम पोंगल- हर दिन का अपना अलग महत्व होता है. कर्नाटक में एलु बेल्ला बांटा जाता है, जबकि आंध्र प्रदेश और तेलंगाना में यह पर्व चार दिनों तक रंगोली, बैलों की सजावट और लोकनृत्यों के साथ मनाया जाता है. केरल में इसे ‘मकरविलक्कु’ कहा जाता है और सबरीमाला मंदिर में विशेष आयोजन होते हैं.

पूर्वी और पूर्वोत्तर भारत की परंपराएं

पश्चिम बंगाल में मकर संक्रांति को पौष संक्रांति कहा जाता है, जहां पिठे-पुली जैसी मिठाइयां बनाई जाती हैं. ओडिशा में भगवान जगन्नाथ को मकर चौला भोग अर्पित किया जाता है. असम, मेघालय और मिजोरम में यह पर्व माघ बिहू या भोगाली बिहू के रूप में मनाया जाता है, जिसमें अलाव, सामूहिक भोज और खेलों का आयोजन होता है.

एक भाव, अनेक रूप

मकर संक्रांति केवल धार्मिक पर्व नहीं, बल्कि किसान जीवन, सामूहिक एकता और प्रकृति के प्रति सम्मान का प्रतीक है. कहीं यह खिचड़ी है, कहीं लोहड़ी, कहीं उत्तरायण, पोंगल, माघ बिहू या टूसू, लेकिन भाव हर जगह एक ही है- सूर्य, फसल और जीवन के प्रति आभार. यही विविधता में एकता भारत की सांस्कृतिक पहचान को मजबूत बनाती है और मकर संक्रांति को एक ऐसा पर्व बनाती है, जो पीढ़ियों से लोगों को जोड़ता आ रहा है और आगे भी जोड़ता रहेगा.

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