महाराष्ट्र की राजनीति में बड़ा उलटफेर, अकोट नगर परिषद में BJP-AIMIM ने मिलाए हाथ

महाराष्ट्र के अकोला जिले की अकोट नगर परिषद में BJP और AIMIM समेत कई दलों ने मिलकर ‘अकोट विकास मंच’ बनाया है. स्पष्ट बहुमत न मिलने के बाद बने इस गठबंधन ने स्थानीय राजनीति में हलचल मचा दी है.

Shraddha Mishra

राजनीति को लेकर अक्सर कहा जाता है कि यहां दोस्ती और दुश्मनी स्थायी नहीं होती, हालात के हिसाब से समीकरण बदलते रहते हैं. महाराष्ट्र के अकोला जिले से आई ताजा खबर ने इस बात को एक बार फिर सही साबित कर दिया है. यहां भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) और असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी AIMIM, जो आमतौर पर एक-दूसरे की कट्टर विरोधी मानी जाती हैं, एक ही मंच पर आ गई हैं. अकोट नगर परिषद में बने इस अनोखे गठबंधन ने न सिर्फ स्थानीय बल्कि राज्य की राजनीति में भी हलचल पैदा कर दी है.

‘अकोट विकास मंच’ का गठन

अकोट नगर परिषद की कुल 35 सीटों में से 33 सीटों पर चुनाव हुए. नतीजों में किसी भी एक पार्टी को स्पष्ट बहुमत नहीं मिला. बीजेपी सबसे बड़ी पार्टी बनकर जरूर उभरी, लेकिन उसके पास अकेले सत्ता बनाने के लिए जरूरी संख्या नहीं थी. ऐसे में सत्ता की कुर्सी तक पहुंचने के लिए गठबंधन ही एकमात्र रास्ता बचा.

सत्ता का रास्ता खोलने के लिए बीजेपी ने एक ऐसा कदम उठाया, जिसकी किसी को उम्मीद नहीं थी. बीजेपी की माया धुले नगराध्यक्ष चुनी गईं, लेकिन परिषद को स्थिर रूप से चलाने के लिए उन्होंने कई दलों को साथ लेकर एक नया गठबंधन बनाया, जिसे नाम दिया गया- ‘अकोट विकास मंच’. इस मंच को औपचारिक रूप से अकोला के जिला मजिस्ट्रेट के पास पंजीकृत भी कराया गया है.

कौन-कौन शामिल है इस गठबंधन में

इस गठबंधन की सबसे चौंकाने वाली बात यही है कि इसमें एक-दूसरे के कट्टर विरोधी दल भी शामिल हैं.

BJP: 11 सीटें

AIMIM: 05 सीटें

प्रहार जनशक्ति पक्ष: 03 सीटें

शिवसेना (उद्धव गुट): 02 सीटें

शिवसेना (शिंदे गुट): 01 सीट

NCP (अजीत पवार): 02 सीटें

NCP (शरद पवार): 01 सीट

क्यों है यह गठबंधन चौंकाने वाला

बीजेपी आमतौर पर हिंदुत्व और राष्ट्रवाद की राजनीति करती है, वहीं AIMIM खुद को मुस्लिम हितों की आवाज बताती है. दोनों पार्टियां राष्ट्रीय और राज्य स्तर पर एक-दूसरे के खिलाफ तीखे बयान देती रही हैं. ऐसे में स्थानीय स्तर पर दोनों का साथ आना लोगों के लिए हैरानी भरा है. राजनीतिक जानकारों का मानना है कि इस गठबंधन में विचारधारा से ज्यादा महत्व सत्ता और प्रशासनिक नियंत्रण को दिया गया है. “विकास” को साझा एजेंडा बनाकर दलों ने अपने पुराने मतभेदों को फिलहाल पीछे रख दिया है।

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