मुंबई ने बदली सियासी दिशा... ठाकरे ब्रदर्स के काम नहीं आया नाम और विरासत, 25 साल का वर्चस्व खत्म

बीएमसी चुनावों में ठाकरे परिवार की दशकों पुरानी सत्ता समाप्त हो गई. उद्धव और राज ठाकरे की एकता मराठी वोटों को जोड़ने में विफल रही, जबकि बीजेपी ने इस जीत के साथ महाराष्ट्र की राजनीति में अपनी सबसे मजबूत स्थिति स्थापित कर ली.

Shraddha Mishra

एक समय था जब बाला साहेब ठाकरे के एक इशारे पर मुंबई ठहर जाया करती थी. लेकिन वक्त बदला और वही मुंबई अब उद्धव ठाकरे और राज ठाकरे से दूरी बनाती नजर आई. बीएमसी चुनावों में यह साफ हो गया कि सिर्फ नाम और विरासत के सहारे राजनीति अब नहीं चलती. दशकों तक मुंबई महानगरपालिका पर राज करने वाला ठाकरे परिवार इस बार सत्ता से बाहर हो गया और 25 साल से ज्यादा पुराना वर्चस्व समाप्त हो गया.

बीएमसी चुनाव से पहले उद्धव ठाकरे और राज ठाकरे ने अपनी वर्षों पुरानी दुश्मनी खत्म की. साथ तस्वीरें खिंचवाईं, एक-दूसरे के घर गए और यह संदेश देने की कोशिश की कि दोनों के एक होते ही मुंबई उनके पीछे खड़ी हो जाएगी. उद्धव ठाकरे का आत्मविश्वास इतना बढ़ गया कि उन्होंने हाल ही में सहयोगी बनी कांग्रेस और शरद पवार की एनसीपी को भी किनारे कर दिया. लेकिन यह रणनीति उलटी पड़ गई. मराठी वोटों के एकजुट होने की बजाय उनका बंटवारा हो गया और इसका सीधा फायदा बीजेपी गठबंधन को मिला. नतीजा यह रहा कि शिवसेना का वह किला ढह गया, जिस पर पार्टी 1985 से काबिज थी.

बीएमसी: सिर्फ नगर निकाय नहीं, सत्ता का केंद्र

1865 में स्थापित बीएमसी सिर्फ एक नगर निगम नहीं है, बल्कि भारत का सबसे धनी स्थानीय निकाय है. 74 हजार करोड़ रुपये से ज्यादा के वार्षिक बजट के साथ इसकी आर्थिक ताकत कई छोटे राज्यों से भी ज्यादा है. लंबे समय तक शिवसेना के नियंत्रण में रहने वाली इस संस्था पर अब बीजेपी का कब्जा हो गया है, जो महाराष्ट्र की राजनीति में बड़ा बदलाव माना जा रहा है.

हार के बाद आरोपों की राजनीति

इतनी बड़ी हार के बाद भी शिवसेना (यूबीटी) के नेताओं का रुख चौंकाने वाला रहा. पार्टी के सांसद संजय राउत ने सोशल मीडिया पर एकनाथ शिंदे की तुलना जयचंद से करते हुए आरोप लगाया कि अगर शिंदे ने बगावत नहीं की होती, तो बीजेपी मुंबई में कभी मेयर नहीं बना पाती. दूसरी ओर, बीजेपी इस ऐतिहासिक जीत से बेहद उत्साहित नजर आई.

मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने जीत का श्रेय पार्टी कार्यकर्ताओं को दिया, जबकि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने मुंबईवासियों का आभार जताते हुए कहा कि मुंबई देश के विकास को गति देने वाला शहर है और यहां सुशासन तथा बेहतर जीवन की दिशा में काम किया जाएगा.

उद्धव ठाकरे की हार के कारण

सवाल यह है कि 2024 के लोकसभा चुनाव में अच्छा प्रदर्शन करने वाले उद्धव ठाकरे को पहले विधानसभा और फिर बीएमसी चुनाव में करारी हार क्यों मिली. इसका जवाब उसी लोकसभा चुनाव से जुड़ा है. उस समय विपक्ष पूरी तरह एकजुट था और सीट बंटवारे में कोई खास तनाव नहीं था. इस सफलता से उद्धव ठाकरे को यह भरोसा हो गया कि जीत का श्रेय मुख्य रूप से उन्हें जाता है.

विधानसभा चुनाव तक आते-आते यह भरोसा अहंकार में बदल गया. कांग्रेस और शरद पवार से दूरी बढ़ी, गठबंधन कमजोर हुआ और हार सामने आ गई. बीएमसी चुनाव में राज ठाकरे से हाथ मिलाकर उन्होंने मराठी वोटों को साधने की कोशिश की, लेकिन विचारधारा की अस्थिरता ने मतदाताओं को भ्रमित कर दिया.

उद्धव ठाकरे ने कभी हिंदुत्व के नाम पर बीजेपी से नाता तोड़ा, फिर सेक्युलर राजनीति के तहत कांग्रेस और एनसीपी से हाथ मिलाया और बाद में उनसे भी दूरी बना ली. वहीं राज ठाकरे भी हर चुनाव में अलग रुख अपनाते रहे. बार-बार बदलती विचारधारा ने न सिर्फ कट्टर हिंदू वोटरों को दूर किया, बल्कि मराठी मतदाता भी उनसे खिसक गया.

बीजेपी के लिए बड़ी राहत

बीजेपी के लिए यह चुनाव कई मायनों में शुभ संकेत लेकर आया है. ठाकरे बंधुओं का प्रयोग खत्म हो गया, शरद पवार और अजीत पवार की जोड़ी भी असर नहीं दिखा सकी और कांग्रेस और कमजोर हुई. 29 नगर निकायों में बीजेपी ने अपनी ताकत बढ़ाई है. साफ है कि इस चुनाव के जरिए बीजेपी ने महाराष्ट्र की राजनीति में भविष्य के कई संभावित समीकरणों को तोड़ दिया है और खुद को सबसे मजबूत शक्ति के रूप में स्थापित कर लिया है.

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