शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद ने बिना संगम स्नान किए छोड़ा माघ मेला, प्रयागराज से काशी के लिए हुए रवाना

प्रयागराज माघ मेले में पुलिस-प्रशासन से विवाद के बाद शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद ने मेला बीच में छोड़ने का फैसला किया. उन्होंने सनातन धर्म के अपमान और अपनी सुरक्षा को लेकर गंभीर चिंता जताई.

Shraddha Mishra

प्रयागराज: हर साल लाखों श्रद्धालुओं को आकर्षित करने वाला माघ मेला इस बार विवादों के कारण सुर्खियों में आ गया है. इसी बीच शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद ने माघ मेला अचानक छोड़ने का फैसला कर लिया और बुधवार सुबह प्रयागराज से काशी के लिए रवाना हो गए. यह फैसला इसलिए भी चर्चा में है क्योंकि पहली बार ऐसा हुआ है जब माघ मेले में शामिल होने के बाद शंकराचार्य बिना संगम स्नान किए ही लौट गए.

यह फैसला पुलिस और प्रशासनिक अधिकारियों के साथ मौनी अमावस्या पर हुए विवाद के बाद आया. उस दिन शंकराचार्य ने रिवाज के अनुसार स्नान नहीं किया था और उसके बाद से वह अपने शिविर में भी नहीं गए. बुधवार को मेला का ग्यारहवां दिन था, लेकिन शंकराचार्य अपनी जगह छोड़कर शिविर में नहीं गए और धरने पर ही डटे रहे. देर रात समर्थकों से लंबी बातचीत के बाद उन्होंने माघ मेला बीच में ही छोड़ने का निर्णय लिया. 

माघ मेला छोड़ने से पहले शंकराचार्य का भावुक संदेश

मेला छोड़ने से पहले शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद ने गहरी पीड़ा व्यक्त करते हुए कहा कि उन्होंने अन्याय के खिलाफ आवाज उठाई है और अब भी न्याय की प्रतीक्षा कर रहे हैं. उन्होंने कहा कि प्रयाग की धरती पर लोग आत्मिक शांति की खोज में आते हैं, लेकिन आज उन्हें बेहद भारी मन से यहां से लौटना पड़ रहा है.

उनका कहना था कि यहां जो कुछ भी हुआ, उसने न केवल उनकी आत्मा को झकझोर दिया, बल्कि न्याय और मानवता पर उनके विश्वास को भी आघात पहुंचाया है. शंकराचार्य ने संगम स्नान के महत्व को बताते हुए कहा कि यह केवल एक धार्मिक परंपरा नहीं, बल्कि आत्मा को संतोष देने वाला अनुभव होता है.

मन की व्यथा के साथ लिया गया कठिन निर्णय

शंकराचार्य ने कहा कि वर्तमान मानसिक स्थिति में संगम स्नान का संकल्प पूरा करना संभव नहीं था. जब मन व्यथित हो और हृदय में पीड़ा हो, तब पवित्र जल की शीतलता भी अपना अर्थ खो देती है. इसी भाव के साथ वे माघ मेला छोड़कर जा रहे हैं.

उन्होंने यह भी कहा कि वे समाज, सनातन धर्म के अनुयायियों, मेला प्रशासन और शासन तक यह संदेश पहुंचाना चाहते हैं कि उनका जाना केवल एक प्रस्थान नहीं है, बल्कि अपने पीछे कई ऐसे प्रश्न छोड़ जाना है, जिनके उत्तर अभी बाकी हैं. उनके अनुसार ये प्रश्न सिर्फ प्रयाग की हवा में ही नहीं, बल्कि पूरे समाज और विश्व के वातावरण में गूंजते रहेंगे.

माघ मेला और कल्पवास की जानकारी

माघ मेला हर साल मकर संक्रांति से लेकर महाशिवरात्रि तक लगभग डेढ़ महीने तक चलता है. इस दौरान कल्पवास के लिए आने वाले भक्त मकर संक्रांति से माघ पूर्णिमा तक यहीं ठहरते हैं. इस साल माघ पूर्णिमा 1 फरवरी को है. पहले यह माना जा रहा था कि शंकराचार्य माघ पूर्णिमा तक मेले में रहेंगे, लेकिन हालिया घटनाओं के बाद उनके बीच में मेला छोड़ने की खबर सामने आई है.

विरोध प्रदर्शन और प्रशासन पर आरोप

शंकराचार्य ने माघ मेले में विरोध प्रदर्शन के दसवें दिन भी स्पष्ट कर दिया था कि वह मेला छोड़कर नहीं जाएंगे. उनका कहना था कि यदि वे चले गए तो तरह-तरह की अफवाहें फैलाई जाएंगी. उन्होंने जोर देकर कहा कि उनका विरोध सनातन धर्म और संतों के साथ हुए अन्याय के खिलाफ है. शंकराचार्य ने आरोप लगाया कि प्रशासन की लापरवाही या कर्मचारी/अधिकारी की गैरजिम्मेदारी नहीं, बल्कि यह घटना हुक्मरानों के इशारे पर हुई प्रतीत होती है.

सुरक्षा की चिंता और हत्या की आशंका

शंकराचार्य ने यह भी जताया कि उन्हें अपने जीवन को खतरा महसूस हो रहा है. उन्होंने कहा कि उन्हें हत्या की साजिश का डर है और अगर ऐसा कुछ हुआ तो उन्हें ही दोषी ठहराया जाएगा. उन्होंने पिछले महाकुंभ में हुई मौतों का उदाहरण देते हुए सवाल उठाया कि जब इतने लोग मारे गए तो क्या किसी अधिकारी या कर्मचारी के खिलाफ कोई कार्रवाई हुई? शंकराचार्य ने कहा कि उनके मारे जाने की स्थिति में भी कोई जिम्मेदार नहीं ठहराया जाएगा. इसके बावजूद उन्होंने यह साफ किया कि वे गोरक्षा और सनातन धर्म की आवाज़ उठाना बंद नहीं करेंगे.

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