गुजरात में UCC बिल पर बहस तेज, बड़ा सुधार या चुनावी 'कॉपी-पेस्ट' मॉडल?
गुजरात में UCC बिल पेश होने के बाद बहस तेज हो गई है. जहां इसे बड़ा सामाजिक सुधार बताया जा रहा है, वहीं कई लोग इसे चुनावी रणनीति और ‘कॉपी-पेस्ट’ मॉडल करार दे रहे हैं.

नई दिल्ली: उत्तराखंड के बाद अब गुजरात भी समान नागरिक संहिता (UCC) लागू करने की दिशा में आगे बढ़ रहा है. मुख्यमंत्री भूपेंद्र पटेल द्वारा विधानसभा में विधेयक पेश किए जाने के बाद यह मुद्दा एक बार फिर राष्ट्रीय बहस के केंद्र में आ गया है.
जहां एक ओर इसे ‘एक देश, एक कानून’ की दिशा में बड़ा कदम बताया जा रहा है, वहीं दूसरी ओर इस प्रस्तावित कानून को लेकर कई गंभीर सवाल भी उठ रहे हैं. समर्थक इसे सामाजिक सुधार की दिशा में अहम पहल मान रहे हैं, जबकि आलोचक इसे जल्दबाजी और राजनीतिक रणनीति का हिस्सा बता रहे हैं.
UCC का मूल उद्देश्य क्या है?
समान नागरिक संहिता का विचार यह है कि विवाह, तलाक और उत्तराधिकार जैसे निजी मामलों में सभी नागरिकों के लिए एक समान कानून हो. यह अवधारणा लंबे समय से भारतीय राजनीति और समाज में चर्चा का विषय रही है.
राम मंदिर और धारा 370 जैसे मुद्दों के बाद UCC को भाजपा के प्रमुख एजेंडे में अहम स्थान दिया गया है.
महिला अधिकार बनाम आदिवासी छूट
इस विधेयक को महिला सशक्तिकरण की दिशा में एक बड़ा कदम माना जा रहा है. इसमें हलाला और बहुविवाह जैसी प्रथाओं पर रोक लगाने का प्रस्ताव है. समर्थकों का मानना है कि इससे महिलाओं को कानूनी सुरक्षा और बराबरी का अधिकार मिलेगा.
हालांकि, सवाल यह उठ रहा है कि गुजरात की करीब 15% आदिवासी आबादी को इस कानून से बाहर क्यों रखा गया है. अगर उद्देश्य समानता है, तो क्या यह छूट उस सिद्धांत के विपरीत नहीं जाती?
लिव-इन रिलेशनशिप पर नया नियम
विधेयक में लिव-इन रिलेशनशिप का पंजीकरण अनिवार्य किया गया है. नियमों के उल्लंघन पर सजा का प्रावधान भी रखा गया है. सरकार का तर्क है कि इससे महिलाओं को सुरक्षा मिलेगी और उनके अधिकारों की रक्षा होगी.
वहीं, आलोचकों का कहना है कि यह प्रावधान निजता के अधिकार में दखल दे सकता है और इसे ‘मॉरल पुलिसिंग’ के रूप में देखा जा रहा है.
धार्मिक स्वतंत्रता बनाम समान कानून
संविधान का अनुच्छेद 25 नागरिकों को अपने धर्म के अनुसार जीवन जीने की स्वतंत्रता देता है. ऐसे में UCC को लेकर अल्पसंख्यकों के बीच अपनी पहचान को लेकर चिंता भी सामने आ रही है. सरकार का कहना है कि यह कानून किसी धर्म के खिलाफ नहीं, बल्कि नागरिकों के अधिकारों को समान बनाने के लिए है.
चुनावी टाइमिंग और व्यावहारिक चुनौतियां
गुजरात में आगामी चुनावों के बीच इस विधेयक का आना इसे राजनीतिक नजरिए से भी देखा जा रहा है. कुछ लोग इसे उत्तराखंड मॉडल का 'कॉपी-पेस्ट' बता रहे हैं. सवाल यह भी है कि क्या अलग सामाजिक संरचना वाले राज्यों में एक ही मॉडल समान रूप से प्रभावी हो पाएगा.
समानता बनाम एकरूपता की बहस
विशेषज्ञों का मानना है कि समान नागरिक संहिता का विचार प्रगतिशील जरूर है, लेकिन इसकी सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि इसे समाज कितना स्वीकार करता है.चुनौती यह है कि कानून केवल कागजों पर समान न दिखे, बल्कि समाज के हर वर्ग को न्याय और सम्मान दिलाने में सक्षम हो.


