पजामा खीचना 'रेप की कोशिश नहीं', सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट का फैसला पलटा

नाबालिग से दुष्कर्म के प्रयास से जुड़े एक अहम मामले में सुप्रीम कोर्ट ने इलाहाबाद हाईकोर्ट के विवादित फैसले को रद्द कर दिया. अदालत ने साफ कहा कि पायजामा फाड़ना और घसीटने की कोशिश 'सिर्फ तैयारी' नहीं बल्कि दुष्कर्म के प्रयास की श्रेणी में आता है.

Yogita Pandey
Edited By: Yogita Pandey

नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने इलाहाबाद हाईकोर्ट के उस विवादित आदेश को निरस्त कर दिया है, जिसमें कहा गया था कि नाबालिग का पायजामा पकड़ना या नाड़ा तोड़ना 'बलात्कार के प्रयास' की श्रेणी में नहीं आता. शीर्ष अदालत ने इस मामले में स्वतः संज्ञान लेते हुए स्पष्ट किया कि आरोपियों की हरकतें पूर्वनियत मंशा के साथ दुष्कर्म के प्रयास की ओर बढ़े हुए कदम मानी जाएंगी.

अदालत ने कहा कि नाबालिग को पकड़ना, उसका पायजामा फाड़ना और उसे घसीटने की कोशिश करना केवल तैयारी नहीं, बल्कि दुष्कर्म के प्रयास की गंभीर श्रेणी में आता है. इसी के साथ सुप्रीम कोर्ट ने ट्रायल कोर्ट द्वारा लगाए गए गंभीर आरोपों (IPC धारा 376 आदि) को बहाल कर दिया.

सुप्रीम कोर्ट की कड़ी टिप्पणी

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि वह हाईकोर्ट के इस निष्कर्ष से सहमत नहीं हो सकता कि आरोप केवल बलात्कार की तैयारी तक सीमित थे. अदालत के अनुसार, आरोपियों की हरकतें स्पष्ट रूप से दुष्कर्म के प्रयास की ओर इशारा करती हैं.

पीठ ने हाईकोर्ट के आदेश को "चौंकाने वाला और असंवेदनशील" बताते हुए रद्द कर दिया. कोर्ट ने यह भी कहा कि यौन अपराधों से जुड़े मामलों में न्यायिक प्रक्रिया में संवेदनशीलता आवश्यक है और ऐसे मामलों में मानक भारत की सामाजिक-सांस्कृतिक परिस्थितियों से जुड़े होने चाहिए.

विशेषज्ञ समिति गठित करने का निर्देश

यह स्वतः संज्ञान वरिष्ठ वकील शोभा गुप्ता द्वारा NGO 'वी द वुमेन ऑफ इंडिया' की ओर से भेजे गए पत्र के आधार पर लिया गया. सुप्रीम कोर्ट ने राष्ट्रीय न्यायिक अकादमी को निर्देश दिया है कि वह यौन अपराधों के मामलों में न्यायाधीशों के दृष्टिकोण को लेकर दिशा-निर्देश तैयार करने हेतु एक विशेषज्ञ समिति गठित करे.

पीठ, जिसमें चीफ जस्टिस सूर्यकांत मिश्रा, जस्टिस जॉयमाल्य बागची और जस्टिस एनवी अंजारी शामिल थे, ने कहा कि समिति पूर्व में किए गए न्यायिक और प्रशासनिक उपायों की समीक्षा करेगी. समिति की सिफारिशें जजों को यौन अपराधों से जुड़े मामलों के निपटारे में मार्गदर्शन देंगी.

पॉक्सो एक्ट पर हाईकोर्ट की टिप्पणी

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने अपने आदेश में कहा था कि पीड़िता के साथ ग्रोपिंग और पजामे की डोरी खींचना दुष्कर्म या दुष्कर्म का प्रयास नहीं, बल्कि गंभीर यौन हमला है. हाईकोर्ट ने विशेष पॉक्सो कोर्ट के समन आदेश में संशोधन करते हुए निर्देश दिया था कि आरोपियों पर पॉक्सो एक्ट की धारा 9/10 और आईपीसी की धारा 354-बी के तहत मुकदमा चलाया जाए.

कासगंज का मामला

मामला उत्तर प्रदेश के कासगंज का है, जहां आरोप है कि पवन और आकाश नामक आरोपियों ने 11 वर्षीय बच्ची के साथ अश्लील हरकत की और उसका पायजामा तोड़ दिया. उसे पुलिया के पास ले जाने की कोशिश की गई, लेकिन एक अन्य व्यक्ति के पहुंचने पर आरोपी फरार हो गए.

इस मामले में पहले आईपीसी की धारा 376 और पॉक्सो एक्ट की धारा 18 के तहत समन जारी किया गया था, जिसे हाईकोर्ट ने संशोधित कर दिया था. अब सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद दुष्कर्म के प्रयास से जुड़े गंभीर प्रावधान फिर से लागू होंगे.

ताजा खबरें

ट्रेंडिंग वीडियो

close alt tag