'न्यायपालिका में भ्रष्टाचार' वाले चैप्टर के लिए NCERT ने सार्वजनिक माफी मांगी, SC के आदेश पर पूरी किताब वापस ली

कक्षा 8 की NCERT किताब में 'न्यायपालिका में भ्रष्टाचार' वाला विवादित अध्याय सुप्रीम कोर्ट की कड़ी फटकार के बाद अब गायब हो गया है. कोर्ट ने इसे न्यायपालिका की गरिमा पर हमला बताया और किताब पर पूरा प्रतिबंध लगा दिया. NCERT ने तुरंत बिना शर्त माफी मांगी और पूरी किताब वापस ले ली गई.

Goldi Rai
Edited By: Goldi Rai

न्यायपालिका में भ्रष्टाचार को लेकर कक्षा 8 की एनसीईआरटी किताब में विवादास्पद अध्याय शामिल करने पर सुप्रीम कोर्ट से कड़ी फटकार और पुस्तक पर प्रतिबंध लगने के बाद अब राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद ने सार्वजनिक रूप से बिना शर्त माफी मांग ली है. मंगलवार को जारी बयान में एनसीईआरटी ने स्वीकार किया कि विवादित अध्याय गलत था और पूरी किताब को वापस ले लिया गया है, जो अब कहीं भी उपलब्ध नहीं है.यह मामला तब सुर्खियों में आया जब उच्चतम न्यायालय ने स्वतः संज्ञान लेते हुए एनसीईआरटी को तलब किया और पुस्तक की सभी प्रतियों को तुरंत वापस लेने का आदेश दिया. सुप्रीम कोर्ट ने अध्याय की सामग्री को न्यायपालिका की गरिमा को कमजोर करने वाला सुनियोजित प्रयास करार दिया था.

एनसीईआरटी ने मांगी बिना शर्त माफी

एनसीईआरटी ने मंगलवार को सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर पोस्ट कर माफी मांगी. संस्था ने लिखा, NCERT ने हाल ही में सोशल साइंस टेक्स्टबुक, एक्सप्लोरिंग सोसाइटी: इंडिया एंड बियॉन्ड, ग्रेड 8 पार्ट .. पब्लिश की थी, जिसमें चैप्टर IV का शीर्षक, हमारे समाज में ज्यूडिशियरी की भूमिका था. NCERT के निर्देशक और सदस्य उस अध्याय के लिए बिना शर्त माफी मांगते हैं.
एनसीईआरटी ने आगे स्पष्ट किया कि पूरी किताब वापस ले ली गई है और अब यह कहीं उपलब्ध नहीं है.

सुप्रीम कोर्ट का स्वतः संज्ञान

पिछले महीने सुप्रीम कोर्ट ने इस मुद्दे पर खुद संज्ञान लेते हुए एनसीईआरटी को कड़ी फटकार लगाई थी. कोर्ट ने कक्षा 8 की सामाजिक विज्ञान की नई पाठ्यपुस्तक पर प्रतिबंध लगा दिया और 'न्यायपालिका में भ्रष्टाचार' का जिक्र करने वाले अध्याय पर गंभीर आपत्ति जताई. उच्चतम न्यायालय ने मुद्रित और डिजिटल सभी प्रतियों को स्कूलों, दुकानों और ऑनलाइन प्लेटफॉर्म से तुरंत वापस लेने का निर्देश दिया था.

सुनियोजित कदम- मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत

मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति विपुल एम पांचोली की पीठ ने सुनवाई के दौरान कहा कि अध्याय की सामग्री न्यायपालिका की गरिमा और अधिकार को कम करने का एक गहरा और जानबूझकर किया गया प्रयास प्रतीत होती है.

कोर्ट ने अवमानना अधिनियम के तहत एनसीईआरटी के निदेशक और स्कूल शिक्षा विभाग को नोटिस जारी करते हुए पूछा कि उनके और इसमें शामिल अन्य लोगों के खिलाफ अवमानना की कार्यवाही क्यों न शुरू की जाए. उच्चतम न्यायालय ने कहा ि यह एक सुनियोजित कदम है. पूरे शिक्षण समुदाय को बताया जाएगा कि न्यायपालिका भ्रष्ट है और मामले लंबित हैं. फिर छात्र और माता-पिता. यह एक गहरी साजिश है.

न्यायालय ने यह भी टिप्पणी की कि ऐसा लगता है कि पुस्तक में शब्दों और भावों का चयन केवल अनजाने में या सद्भावनापूर्ण त्रुटि नहीं हो सकता है. सुप्रीम कोर्ट ने उन बैठकों का विवरण भी मांगा था जिनमें इस अध्याय की सामग्री पर चर्चा हुई और इसे मंजूरी दी गई थी. कोर्ट ने नोट किया कि पुस्तक लोकतांत्रिक ढांचे को संरक्षित और मजबूत करने में उच्चतम न्यायालय, उच्च न्यायालयों और निचली अदालतों द्वारा निभाई गई भूमिका पर मौन है. पीठ ने कहा कि अगर सामग्री को जानबूझकर न्यायपालिका को कमजोर करने का प्रयास पाया गया, तो यह आपराधिक अवमानना के समान हो सकता है.

आलोचना को दबाने का प्रयास नहीं

सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि यह कार्यवाही निष्पक्ष आलोचना को दबाने या न्यायपालिका के बारे में शैक्षणिक चर्चा को रोकने के लिए नहीं है. कोर्ट ने कहा कि स्वस्थ बहस संस्थाओं को मजबूत करती है. हालांकि, युवा छात्रों को ऐसे एकतरफा और भ्रामक विमर्श के संपर्क में नहीं लाया जाना चाहिए जो न्याय प्रणाली में जनता के विश्वास को नुकसान पहुंच सके.

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