मंदिरों में गैर-हिंदुओं की एंट्री पर नया मोड़: केरल हाईकोर्ट के फैसले से छिड़ी ताजा बहस
केरल हाईकोर्ट के एक अहम फैसले ने हिंदू मंदिरों में गैर-हिंदुओं के प्रवेश को लेकर दशकों पुराने नियम पर नई बहस छेड़ दी है. अदालत ने याचिका खारिज करते हुए राज्य सरकार से नियमों की समीक्षा करने को कहा है.

नई दिल्ली: केरल हाईकोर्ट के एक अहम फैसले ने हिंदू मंदिरों में गैर-हिंदुओं के प्रवेश को लेकर दशकों पुराने नियम पर नई चर्चा छेड़ दी है. अदालत ने जहां मंदिर में दो ईसाई पादरियों के प्रवेश से जुड़े मामले में दायर याचिका को खारिज कर दिया, वहीं राज्य सरकार से यह भी कहा कि वह इस विषय से जुड़े नियमों की दोबारा समीक्षा करे.
अदालत की टिप्पणी के बाद यह सवाल फिर से उठ खड़ा हुआ है कि क्या मौजूदा दौर में मंदिरों में गैर-हिंदुओं की एंट्री पर पूरी तरह रोक संवैधानिक मूल्यों के अनुरूप है. हाईकोर्ट ने साफ संकेत दिए कि कानून समय और समाज के साथ बदलते हैं, ऐसे में पुराने नियमों को नए नजरिए से देखने की जरूरत है.
दो ईसाई पादरियों की एंट्री से जुड़ा है मामला
यह पूरा मामला वर्ष 2023 का है, जब केरल के अदूर स्थित श्री पार्थसारथी मंदिर में दो ईसाई पादरियों को आमंत्रित कर मंदिर में प्रवेश दिया गया था. यह मंदिर त्रावणकोर देवास्वोम बोर्ड के अधीन आता है. इस घटना को लेकर एक श्रद्धालु सनिल नारायणन नंपूथिरी ने हाईकोर्ट में याचिका दाखिल की थी.
याचिकाकर्ता का दावा था कि यह प्रवेश केरल हिंदू प्लेसेज ऑफ पब्लिक वर्शिप एक्ट, 1965 और उससे जुड़े नियमों का उल्लंघन है. खासतौर पर नियम 3(a) का हवाला दिया गया, जिसमें गैर-हिंदुओं के मंदिर में प्रवेश पर रोक की बात कही गई है.
कानून और नियम में दिखा विरोधाभास
मामले की सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट की डिवीजन बेंच ने पाया कि मूल कानून में गैर-हिंदुओं के प्रवेश पर कोई स्पष्ट प्रतिबंध नहीं है, जबकि नियम 3(a) ऐसा प्रतिबंध लगाता है. अदालत ने कहा कि यदि नियम और मूल कानून में टकराव है, तो प्राथमिकता मूल कानून को दी जानी चाहिए.
कोर्ट ने यह भी माना कि गैर-हिंदुओं के प्रवेश पर रोक को धार्मिक परंपरा कहा जा सकता है, लेकिन इसे हिंदू धर्म की अनिवार्य धार्मिक प्रथा नहीं माना जा सकता.
हाईकोर्ट ने याचिका पर क्या फैसला दिया?
हाईकोर्ट ने याचिका को खारिज करते हुए कहा कि इस मामले में मंदिर प्रशासन की ओर से कोई ऐसा कदम नहीं उठाया गया, जो मूल कानून के सीधे खिलाफ हो. हालांकि, अदालत ने राज्य सरकार से यह जरूर कहा कि वह मंदिरों में गैर-हिंदुओं के प्रवेश पर रोक लगाने वाले नियम की समीक्षा करे.
अदालत ने स्पष्ट किया कि नियम और कानून के बीच जो विरोधाभास सामने आया है, उस पर सरकार को फैसला लेना चाहिए कि नियम को जारी रखा जाए या उसमें संशोधन किया जाए.
धार्मिक परंपराओं पर अदालत की अहम टिप्पणी
अपने फैसले में हाईकोर्ट ने कहा कि धार्मिक परंपराएं महत्वपूर्ण होती हैं, लेकिन कानून और समाज स्थिर नहीं रहते. कोर्ट ने कहा कि “कानून समय के साथ बदलता है और समाज की जरूरतों के अनुसार विकसित होना चाहिए.”
अदालत ने यह भी जोड़ा कि गैर-हिंदुओं के प्रवेश पर रोक को धार्मिक परंपरा तो माना जा सकता है, लेकिन यह हिंदू धर्म की अनिवार्य धार्मिक परंपरा नहीं है, जिसे संविधान की कसौटी पर परखा न जा सके.
भविष्य में क्या हो सकता है असर?
यदि राज्य सरकार इस नियम में बदलाव या संशोधन करती है, तो इससे मंदिरों में गैर-हिंदुओं के प्रवेश को लेकर नई व्यवस्था बन सकती है. यह फैसला धार्मिक स्वतंत्रता, समानता और संवैधानिक अधिकारों से जुड़े मुद्दों पर दूरगामी असर डाल सकता है.
साथ ही, इस फैसले के बाद धार्मिक संस्थानों और समाज के भीतर व्यापक बहस छिड़ने की संभावना भी जताई जा रही है.
सरकार और धार्मिक संस्थाओं की भूमिका अहम
हाईकोर्ट ने साफ किया कि इस मुद्दे पर अंतिम निर्णय राज्य सरकार को ही लेना है. अदालत ने सुझाव दिया कि सरकार देवास्वोम बोर्ड, तंत्रियों, धार्मिक विद्वानों और अन्य संबंधित पक्षों से चर्चा कर संतुलित निर्णय ले.
कोर्ट के अनुसार, इस प्रक्रिया में सभी हितधारकों की राय को शामिल करना जरूरी है, ताकि धार्मिक परंपराओं और संवैधानिक मूल्यों के बीच संतुलन बना रहे.


