ऑपरेशन सिंदूर से हिला था पाकिस्तान...ट्रंप के एक्स बॉडीगार्ड के पास गया, करोड़ों रुपये किए खर्च, रिपोर्ट में हुए चौंकाने वाले खुलासे

ऑपरेशन सिंदूर के बाद पाकिस्तान गहरे दबाव में आ गया और सैन्य नुकसान के बीच उसने अमेरिका में आक्रामक लॉबिंग शुरू की. भारत की कार्रवाई रुकवाने, मध्यस्थता कराने और आर्थिक-सैन्य मदद पाने के लिए महंगी अमेरिकी फर्मों को हायर किया गया. FARA दस्तावेजों से खुलासा हुआ कि पाकिस्तान ने करीब 60 बार अमेरिकी प्रशासन, सांसदों और मीडिया से संपर्क किया.

Utsav Singh
Edited By: Utsav Singh

नई दिल्ली : भारत द्वारा शुरू किए गए ऑपरेशन सिंदूर के बाद पाकिस्तान की राजनीतिक और सैन्य व्यवस्था में गहरी बेचैनी देखने को मिली. भारतीय कार्रवाई ने न सिर्फ आतंकी ढांचे को नुकसान पहुंचाया, बल्कि पाकिस्तान के रणनीतिक संतुलन को भी झकझोर दिया. हालात ऐसे बन गए कि पाकिस्तान को अंदेशा होने लगा कि यदि संघर्ष और बढ़ा तो उसकी अंतरराष्ट्रीय स्थिति और कमजोर हो सकती है. इसी डर के कारण पाकिस्तान ने सैन्य मोर्चे के बजाय कूटनीतिक रास्ते से राहत पाने की कोशिश तेज कर दी.

अमेरिका की ओर दौड़ा पाकिस्तान

आपको बता दें कि संकट के समय पाकिस्तान ने सीधे अमेरिका की शरण ली. वॉशिंगटन में उसने एक व्यापक और महंगा लॉबिंग अभियान चलाया, जिसका मकसद भारत की सैन्य कार्रवाई को रुकवाना और अमेरिका से मध्यस्थता कराना था. अमेरिकी सत्ता प्रतिष्ठान तक अपनी बात पहुंचाने के लिए पाकिस्तान ने हर संभव माध्यम अपनाया. इस पूरे प्रयास में बड़ी रकम खर्च की गई और अमेरिका के नीति-निर्माताओं पर असर डालने की कोशिश की गई.

FARA कानून से सामने आई सच्चाई
अमेरिकी Foreign Agents Registration Act यानी FARA के तहत सार्वजनिक हुए दस्तावेजों ने पाकिस्तान की इस रणनीति की पूरी तस्वीर सामने रख दी. यह कानून अमेरिका में विदेशी हितों के लिए काम करने वाले एजेंटों की गतिविधियों में पारदर्शिता सुनिश्चित करता है. FARA फाइलिंग के अनुसार, ऑपरेशन सिंदूर के बाद पाकिस्तान ने अमेरिका में रजिस्टर्ड कई लॉबिंग और लॉ फर्मों के जरिए सरकार, कांग्रेस और प्रशासनिक तंत्र तक अपनी पहुंच बनाई.

60 से ज्यादा बार किया गया अमेरिकी संपर्क
दस्तावेजों से पता चलता है कि पाकिस्तान की ओर से अमेरिकी अधिकारियों से लगभग 60 बार संपर्क किया गया. इन संपर्कों में ईमेल, फोन कॉल, मैसेज और प्रत्यक्ष मुलाकातें शामिल थीं. बातचीत का मुख्य विषय भारत-पाकिस्तान तनाव, क्षेत्रीय अस्थिरता और भारत की सैन्य कार्रवाई को रोकने की अपील था. पाकिस्तान यह दिखाने की कोशिश कर रहा था कि हालात नियंत्रण से बाहर जा सकते हैं और अमेरिका का हस्तक्षेप जरूरी है.

पहलगाम हमले के जवाब में ऑपरेशन सिंदूर 
भारत ने यह सैन्य अभियान पहलगाम आतंकी हमले के जवाब में शुरू किया था. ऑपरेशन के दौरान भारत ने पाकिस्तान में मौजूद आतंकी ठिकानों पर निर्णायक कार्रवाई की और उसके सैन्य ढांचे को भी नुकसान पहुंचाया. इस ऑपरेशन ने साफ संकेत दे दिया कि भारत अब आतंकवाद के खिलाफ सख्त रुख अपनाने से पीछे नहीं हटेगा, चाहे उसका असर सीमा पार क्यों न हो.

ट्रंप के करीबी लोगों तक पहुंचने की कोशिश
पाकिस्तान ने अमेरिका में प्रभाव बढ़ाने के लिए ऐसी फर्मों को भी चुना, जिनमें डोनाल्ड ट्रंप के करीबी रह चुके लोग शामिल थे. इन फर्मों के जरिए पाकिस्तान ने व्हाइट हाउस, पेंटागन और कांग्रेस के भीतर अपनी बात रखने की कोशिश की. उद्देश्य यह था कि सत्ता के शीर्ष स्तर तक सीधी पहुंच बनाकर भारत पर दबाव डलवाया जा सके.

अमेरिकी रिपोर्ट में हुआ बड़ा खुलासा 
FARA फाइलिंग में पाकिस्तान के आर्मी चीफ आसिम मुनीर की अमेरिका यात्रा और उनसे जुड़ी बैठकों का भी उल्लेख है. इससे यह संकेत मिलता है कि यह लॉबिंग अभियान केवल कूटनीतिक नहीं, बल्कि सैन्य और राजनीतिक नेतृत्व की साझा रणनीति थी. प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ की सरकार और सेना दोनों ही अमेरिका से मदद और समर्थन की उम्मीद लगाए हुए थे.

करगिल जैसी रणनीति की पुनरावृत्ति
पाकिस्तान का यह रवैया नया नहीं था. इससे पहले करगिल युद्ध के दौरान भी तत्कालीन प्रधानमंत्री नवाज शरीफ ने अमेरिका से हस्तक्षेप की गुहार लगाई थी. इस बार भी इतिहास खुद को दोहराता नजर आया, जहां सैन्य दबाव बढ़ते ही पाकिस्तान ने एक बार फिर वॉशिंगटन का रुख किया और अंतरराष्ट्रीय समर्थन जुटाने की कोशिश की.

सैन्य कमजोरी, कूटनीतिक शोर
FARA दस्तावेजों से यह साफ होता है कि ऑपरेशन सिंदूर ने पाकिस्तान को रणनीतिक रूप से बैकफुट पर ला दिया. सैन्य स्तर पर नुकसान झेलने के बाद उसने अमेरिका में लॉबिंग को हथियार बनाया. हालांकि, यह पूरा घटनाक्रम यह भी दर्शाता है कि भारत की कार्रवाई ने न सिर्फ जमीनी हालात बदले, बल्कि अंतरराष्ट्रीय मंच पर भी पाकिस्तान की मजबूरी उजागर कर दी.

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