अस्पष्टता और दुरुपयोग की आशंका: जातिगत भेदभाव रोकने वाले UGC के नए नियमों पर सुप्रीम कोर्ट की रोक
सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को UGC द्वारा हाल ही में जारी किए गए भेदभाव विरोधी नियमों के लागू होने पर अंतरिम रोक लगा दी. कोर्ट ने इन नियमों की भाषा को अस्पष्ट बताया, और इनके गलत इस्तेमाल की संभावना और सामाजिक बंटवारे के खतरे का हवाला दिया.

नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) द्वारा हाल ही में अधिसूचित भेदभाव-विरोधी नियमों के क्रियान्वयन पर अंतरिम रोक लगा दी. अदालत ने इन नियमों की भाषा को अस्पष्ट बताते हुए इनके संभावित दुरुपयोग और सामाजिक विभाजन की आशंका जताई है. इस मामले में केंद्र सरकार और यूजीसी को नोटिस जारी किया गया है और अगली सुनवाई तक ये नियम प्रभावी नहीं रहेंगे.
शीर्ष अदालत ने खास तौर पर इस बात पर चिंता जताई कि नियमों में जाति आधारित भेदभाव की परिभाषा स्पष्ट नहीं है और कुछ वर्गों को शिकायत निवारण व्यवस्था से बाहर रखा गया है. कोर्ट ने कहा कि ऐसे प्रावधान दूरगामी और "गंभीर प्रभाव" डाल सकते हैं.
क्या हैं यूजीसी के नए नियम
यूजीसी ने इस महीने की शुरुआत में उच्च शिक्षा संस्थानों में भेदभाव रोकने के लिए नए नियम अधिसूचित किए थे. इनके तहत सभी विश्वविद्यालयों और कॉलेजों में भेदभाव की शिकायतों की जांच और समावेश को बढ़ावा देने के लिए 'समानता समितियों' का गठन अनिवार्य किया गया है. इन समितियों में अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC), अनुसूचित जाति (SC), अनुसूचित जनजाति (ST), दिव्यांगजन और महिलाओं के प्रतिनिधियों को शामिल करने का प्रावधान है.
सामान्य वर्ग को बाहर रखने पर विवाद
नियमों में सामान्य श्रेणी के छात्रों को इस शिकायत निवारण तंत्र के दायरे से बाहर रखा गया है. इसी प्रावधान को लेकर इन नियमों को कानूनी चुनौती दी गई और कई राज्यों में छात्रों ने विरोध प्रदर्शन भी किए. आलोचकों का आरोप है कि इस तरह का ढांचा भेदभाव खत्म करने के बजाय नई असमानता को जन्म दे सकता है.
समाज को विभाजित कर सकते हैं नियम
मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची की पीठ ने कहा कि इस मामले में हस्तक्षेप जरूरी है, क्योंकि ये दिशानिर्देश "समाज को विभाजित करने में सक्षम" हैं. पीठ ने स्पष्ट किया कि 2012 के पूर्ववर्ती दिशानिर्देश, जो सलाहकारी प्रकृति के थे, फिलहाल लागू रहेंगे.
मुख्य न्यायाधीश ने कहा, "अगर हम हस्तक्षेप नहीं करते हैं तो इसके खतरनाक परिणाम होंगे, समाज में विभाजन होगा और इसके गंभीर परिणाम होंगे." उन्होंने आगे जोड़ा, "प्रथम दृष्टया हम कह सकते हैं कि नियम की भाषा अस्पष्ट है और विशेषज्ञों को इसकी भाषा को संशोधित करने के लिए जांच करने की आवश्यकता है ताकि इसका दुरुपयोग न हो."
याचिकाकर्ताओं की आपत्ति
याचिकाकर्ताओं ने दलील दी कि ये नियम भेदभावपूर्ण हैं और SC, ST व OBC से बाहर के छात्रों को संस्थागत संरक्षण से वंचित करते हैं. उनके वकील ने कहा कि ऐसा चयनात्मक ढांचा गैर-आरक्षित वर्गों के प्रति शत्रुता को बढ़ावा दे सकता है और समानता के बजाय विभाजन का माध्यम बन सकता है. उन्होंने जोर दिया कि “सभी नागरिकों को संरक्षित किया जाना चाहिए” और इसे संविधान का मूल दायित्व बताया.
अदालत की अन्य चिंताएं
सुनवाई के दौरान न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची ने विश्वविद्यालय परिसरों में "स्वतंत्र और निष्पक्ष वातावरण" बनाए रखने की प्रतिबद्धता जताई. उन्होंने भेदभाव को परिभाषित करने वाले विशेष खंड पर सवाल उठाया और यह भी पूछा कि नए नियमों में रैगिंग को क्यों हटाया गया है.
समर्थन में दलील
जातिगत भेदभाव के खिलाफ कड़े नियमों की मांग कर रहे पक्ष की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता इंदिरा जयसिंह ने अदालत में उठाई गई चिंताओं का खंडन किया. उन्होंने कहा कि यह याचिका समानता के संवैधानिक दृष्टिकोण और समावेशी समाज की आवश्यकता पर आधारित है.
यूजीसी ने ये नियम 2019 में सुप्रीम कोर्ट में दायर एक जनहित याचिका के बाद तैयार किए थे. यह याचिका रोहित वेमुला और पायल ताडवी की माताओं राधिका वेमुला और अबेदा सलीम ताडवी ,द्वारा दायर की गई थी. दोनों छात्रों ने अपने-अपने विश्वविद्यालयों में कथित जातिगत भेदभाव के कारण आत्महत्या कर ली थी. याचिका में परिसरों में जातिगत भेदभाव समाप्त करने के लिए प्रभावी तंत्र बनाने की मांग की गई थी.


