दिल्ली-मुंबई एक्सप्रेसवे पर ट्रक और वैगनआर की ज़ोरदार टक्कर , मदद न मिलने से दम्पति की गयी जान

पिछले हफ़्ते दिल्ली-मुंबई एक्सप्रेसवे पर हुए दुखद हादसे ने देश में सड़क सुरक्षा, पेट्रोलिंग सिस्टम और इंसानी लापरवाही को लेकर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। दिल्ली के रहने वाले 42 साल के लच्छी राम और 38 साल की कुसुम लता की मौत सिर्फ़ हादसे की वजह से नहीं, बल्कि समय पर मदद न मिलने की वजह से भी हुई।

Utsav Singh
Edited By: Utsav Singh

नई दिल्ली: दिल्ली-मुंबई एक्सप्रेसवे पर पिछले सप्ताह हुई दर्दनाक दुर्घटना ने देश में सड़क सुरक्षा, गश्त व्यवस्था और मानव संवेदनहीनता पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं. दिल्ली के रहने वाले 42 वर्षीय लच्छी राम और 38 वर्षीय कुसुम लता की मौत सिर्फ़ हादसे से नहीं, बल्कि समय पर मदद न मिल पाने की वजह से हुई। एक्सप्रेसवे पर उनकी बुरी तरह क्षतिग्रस्त वैगनआर 8 घंटे तक खड़ी रही, लेकिन न तो कोई राहगीर रुका और न ही पेट्रोलिंग टीम ने ध्यान दिया.

दंपत्ति के मामा नाहर सिंह ने बताया कि परिवार को जानकारी दी गई थी कि एनएचएआई की पेट्रोलिंग गाड़ियाँ हर घंटे उस रूट से गुजरती हैं. उन्होंने सवाल उठाया, “दो लोगों के खून से लथपथ एक पूरी कुचली हुई कार को पेट्रोलिंग टीम कैसे नहीं देख पाया? या तो पूरी लापरवाही थी या फिर यह पेट्रोलिंग सिर्फ़ कागज़ों पर मौजूद है.''

परिवार के अनुसार, एक्सप्रेसवे की निगरानी एनएचएआई और स्थानीय पुलिस, दोनों के अधीन है। लेकिन दुर्घटना के दौरान किसी भी एजेंसी ने समय पर प्रतिक्रिया नहीं दी.

 तुरंत सहायता मिलने पर बच सकती थी दम्पति की जान 

जाँचकर्ताओं के मुताबिक पहला हादसा तब हुआ जब एक मल्टी-एक्सल डंपर ट्रक ने उनकी कार को साइड लेन में धकेल दिया. घटना के 22 मिनट बाद, एक तेज़ रफ़्तार मारुति अर्टिगा ने क्षतिग्रस्त वैगनआर को टक्कर मारी। सीसीटीवी फुटेज में अर्टिगा चालक को गाड़ी पीछे कर मौके से भागते हुए देखा गया. दर्दनाक बात यह रही कि दोनों ड्राइवरों में से कोई भी मदद के लिए नहीं रुका.

दुर्घटना के बाद कार के दरवाज़े जाम हो गए और दंपत्ति अंदर ही फँस गए. एक्सप्रेसवे से गुजरती सैकड़ों गाड़ियों के बावजूद किसी ने रुककर सहायता नहीं की. सुबह 7.38 बजे पुलिस को पहली सूचना मिली, जब ग्रामीणों ने कार और उसके अंदर पड़े शवों को देखा.

परिवार का छाया मातम

लच्छी राम के पिता देवी सिंह, रोते हुए बोले, "वे इस तरह मरने के लायक नहीं थे. अगर वे घायल होते, हम उनकी देखभाल कर लेते. लेकिन मदद के इंतज़ार में दम तोड़ना—यह अधिकारियों की गैरज़िम्मेदारी है." उन्होंने बताया कि वे पूरी रात फोन मिलाते रहे. "पहले घंटी बजती रही, फिर फोन बंद हो गया। सुबह 8 बजे एक पुलिसवाले ने फोन उठाया, तब हमें पता चला कि दोनों अब इस दुनिया में नहीं रहे."

दंपत्ति के चचेरे भाई दीपक ने कहा, "मेरी भाभी को गंभीर चोट नहीं थीं। कोई रुक जाता, तो शायद उनकी जान बच जाती."

इस घटना ने एक बार फिर यह साफ कर दिया है कि सड़क सुरक्षा और गश्त व्यवस्था की वास्तविकता जमीन पर कहीं अधिक कमजोर है, जितनी कागज़ों पर दिखाई देती है.

ताजा खबरें

ट्रेंडिंग वीडियो

close alt tag