'किसी भी देश को क्षेत्रीय विस्तार के लिए धमकी या बल का प्रयोग नहीं करना चाहिए', जी20 के फोरम से उठी ग्लोबल साउथ की आवाज

G20 समिट की संयुक्त घोषणा में बलपूर्वक सीमाएं बदलने का विरोध, मानवाधिकारों का सम्मान, आतंकवाद की निंदा और विकासशील देशों को समर्थन पर जोर दिया गया. पीएम मोदी ने कौशल, तकनीक, खाद्य सुरक्षा और ग्लोबल साउथ की आवाज मजबूत करने की पहलें प्रस्तावित कीं.

Yaspal Singh
Edited By: Yaspal Singh

नई दिल्लीः जोहान्सबर्ग में आयोजित 20वें वार्षिक G20 समिट के पहले ही दिन सदस्य देशों ने एक संयुक्त घोषणा अपनाकर दुनिया को मजबूत संदेश दिया. इस दस्तावेज़ में साफ कहा गया कि किसी भी देश को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मान्यता प्राप्त सीमाओं को बल या धमकी के माध्यम से बदलने की कोशिश नहीं करनी चाहिए. यह बयान वैश्विक संप्रभुता और क्षेत्रीय अखंडता की सामूहिक प्रतिबद्धता को रेखांकित करता है.

दिलचस्प बात यह रही कि अमेरिकी आपत्तियों के बावजूद यह घोषणा सर्वसम्मति से पारित की गई. इसमें आतंकवाद की हर प्रकार से निंदा की गई और मानवाधिकारों तथा मौलिक स्वतंत्रताओं के प्रति अधिक सम्मान की अपील भी शामिल रही.

UN चार्टर के अनुरूप देशों के लिए चेतावनी

टेक्स्ट में बिना किसी देश का नाम लिए कहा गया कि सभी राष्ट्रों को संयुक्त राष्ट्र चार्टर का पालन करते हुए किसी भी अन्य देश की राजनीतिक स्वतंत्रता, क्षेत्रीय अखंडता अथवा शांति के विरुद्ध बल का प्रयोग या धमकी देने से बचना चाहिए.

विश्लेषकों के अनुसार यह संदेश परोक्ष रूप से रूस, इज़रायल और म्यांमार की ओर संकेत करता है, जहाँ हालिया संघर्षों ने वैश्विक अस्थिरता बढ़ाई है. दस्तावेज में बढ़ते जियो-इकोनॉमिक तनाव, असमानता और अस्थिरता को समावेशी विकास के लिए बड़ी चुनौती बताया गया. साथ ही, मल्टीलेटरल सहयोग और वैश्विक साझेदारी को मजबूत करने पर जोर दिया गया.

विकासशील देशों के लिए समर्थन की आवश्यकता

G20 ने यह भी रेखांकित किया कि छोटे द्वीपीय देशों और बेहद कम विकसित राष्ट्रों को जलवायु आपदाओं से उबरने, अनुकूलन और संरक्षण हेतु अधिक समर्थन की जरूरत है. घोषणा में बढ़ते कर्ज़ बोझ की तरफ ध्यान आकर्षित करते हुए कहा गया कि इससे स्वास्थ्य, शिक्षा, इंफ्रास्ट्रक्चर और आपदा प्रबंधन जैसे महत्वपूर्ण क्षेत्रों में निवेश बाधित हो रहा है. सस्टेनेबल इंडस्ट्रियलाइजेशन और एनर्जी ट्रांज़िशन को दीर्घकालिक विकास के लिए अनिवार्य बताया गया.

खाद्य सुरक्षा और तकनीकी प्रगति पर जोर

G20 ने एक बार फिर दोहराया कि भूख से मुक्ति हर व्यक्ति का अधिकार है. इसलिए पौष्टिक भोजन तक पहुंच सुनिश्चित करने के लिए मजबूत राजनीतिक इच्छाशक्ति की जरूरत है. डिजिटल तकनीक और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस को अवसर के रूप में देखते हुए घोषणा में इस बात पर बल दिया गया कि इन तकनीकों का उपयोग मानव कल्याण के लिए जिम्मेदारीपूर्वक किया जाए.

मल्टीलेटरल डेवलपमेंट बैंकों की भूमिका को गरीबी घटाने और विकास की प्रक्रिया को मजबूत करने में अहम बताया गया. दस्तावेज़ के अन्य हिस्सों में जलवायु कार्रवाई, भ्रष्टाचार-निरोध, सूचना दाताओं की सुरक्षा और प्रवासी श्रमिकों तथा शरणार्थियों के समर्थन पर चर्चा हुई.

अफ्रीका की भूमिका 

दक्षिण अफ्रीका के इंटरनेशनल रिलेशंस मंत्री रोनाल्ड लामोला ने इस घोषणा को महत्त्वपूर्ण क्षण बताया और कहा कि इससे अफ्रीकी महाद्वीप को व्यापक लाभ मिल सकता है. अमेरिका की ओर से जताई गई आपत्तियों पर उन्होंने कहा कि G20 किसी एक देश की मौजूदगी या अनुपस्थिति पर निर्भर नहीं है.

वैश्विक दक्षिण की आवाज बुलंद

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने समिट में भाग लेते हुए अफ्रीका में पहली बार आयोजित G20 बैठक की सराहना की. उन्होंने कौशल विकास, खाद्य सुरक्षा, डिजिटल नवाचार और महिला सशक्तिकरण पर भारत की प्रेसीडेंसी के कार्यों को रेखांकित किया.

पीएम मोदी ने छह बड़ी पहलों का प्रस्ताव रखा जिनमें वैश्विक पारंपरिक ज्ञान भंडार, अफ्रीका स्किल्स मल्टीप्लायर और सैटेलाइट डेटा साझेदारी शामिल हैं. उन्होंने जलवायु वित्त में वृद्धि और विकासशील देशों की आवाज़ को वैश्विक शासन में अधिक महत्व देने की आवश्यकता भी बताई.

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