शपथ से ठीक पहले बड़ा झटका! तारिक रहमान ने जुलाई चार्टर ठुकराया, बांग्लादेश में लोकतंत्र सुधार की उम्मीदें धूमिल
जुलाई चार्टर लोकतंत्र को मजबूत करने का एक अच्छा प्रस्ताव था. इसके तहत सबसे पहले सभी निर्वाचित सांसदों को 'संवैधानिक सुधार परिषद' का सदस्य बनकर शपथ लेनी थी. लेकिन बीएनपी ने इसे ठुकरा दिया. पार्टी नेताओं का साफ कहना है कि हम जनता के सामने इसी मकसद से नहीं चुने गए थे.

नई दिल्ली: बांग्लादेश में नई बीएनपी सरकार के गठन के साथ ही जुलाई चार्टर का भविष्य अधर में लटक गया है. मंगलवार 17 फरवरी को तारिक रहमान सहित बीएनपी के निर्वाचित सांसदों ने संवैधानिक सुधार आयोग के सदस्य के रूप में दूसरी शपथ लेने से इनकार कर दिया. बीएनपी नेता सलाहुद्दीन अहमद ने स्पष्ट कहा कि पार्टी इसे मानने से इनकार करती है, क्योंकि यह संविधान में अभी शामिल नहीं है. इससे लोकतंत्र सुधार के लिए यूनुस अंतरिम सरकार द्वारा लाए गए जुलाई चार्टर पर जनमत संग्रह की मंजूरी के बावजूद लागू होने की राह में बड़ा रोड़ा आ गया है.
12 फरवरी को हुए आम चुनाव और जनमत संग्रह में 50 प्रतिशत से अधिक मतदाताओं ने जुलाई चार्टर को मंजूरी दी थी, लेकिन बीएनपी की इस अस्वीकृति से सुधार प्रक्रिया पर सवाल खड़े हो गए हैं. जमात-ए-इस्लामी ने भी इसी रुख का समर्थन किया है और शपथ न लेने की धमकी दी है, जिससे नई संसद की शुरुआत ही विवादास्पद हो गई है.
बीएनपी ने शपथ क्यों ठुकराई?
बीएनपी के सांसदों ने मुख्य चुनाव आयुक्त के सामने सांसद के रूप में शपथ ली, लेकिन संवैधानिक सुधार परिषद के सदस्य के रूप में अतिरिक्त शपथ से इनकार कर दिया. बीएनपी स्टैंडिंग कमिटी सदस्य सलाहुद्दीन अहमद ने तारिक रहमान की मौजूदगी में घोषणा की कि पार्टी इसे नहीं मानती.
जमात भी नहीं मानेगा जुलाई चार्टर
जमात-ए-इस्लामी ने भी जुलाई चार्टर को मानने से इनकार कर दिया है. जमात के नायब अमीर सैयद अब्दुल्ला मुहम्मद ताहेर ने स्थानीय मीडिया से बात करते हुए कहा कि बीएनपी की तरह ही हमारे भी सांसद इस पद की शपथ नहीं लेंगे. हम अपने तरीके से काम करेंगे. जमात ए इस्लामी बांग्लादेश की सबसे बड़ी विपक्षी पार्टी है.
जुलाई चार्टर से क्या-क्या बदलने वाला था?
अगस्त 2024 में शेख हसीना का बांग्लादेश में एक विद्रोह के बाद तख्तापलट हो गया था. इस विद्रोह की शुरुआत जुलाई में हुई थी, जिसे छात्रों ने अंजाम दिया था. इसके बाद यूनुस के नेतृत्व में अंतरिम सरकार का गठन हुआ था. यूनुस सरकार ने लोकतंत्र में सुधार के लिए जुलाई चार्टर का प्रस्ताव लाया. इस प्रस्ताव के तहत कोई भी शख्स बांग्लादेश में एक बार में 10 साल से ज्यादा समय तक प्रधानमंत्री नहीं रह सकते हैं इसके लिए कुछ प्रावधान बनाए गए हैं.
इसके अलावा जुलाई चार्टर के लागू होने पर ये बदलाव भी प्रस्तावित थे..
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संसद को द्विसदनीय (बाइकैमरल) बनाने की बात भी शामिल है. यानी मौजूदा संसद के साथ 100 सीटों वाला एक उच्च सदन बनाया जाएगा. यह भारत के राज्यसभा जैसा हो.
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प्रधानमंत्री पद पर रहने वाला व्यक्ति किसी दूसरे पद को धारण नहीं कर सकता है. यानी जो भी शख्स प्रधानमंत्री बनेगा, उसे पार्टी के अध्यक्ष की कुर्सी छोड़नी होगी.
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बांग्लादेश में अब तक जजों को प्रधानमंत्री ही नियुक्त करते रहे हैं. जुलाई चार्टर में जजों के लिए अलग से कॉलेजियम बनाने की बात कही गई थी. इस कॉलेजियम में सिर्फ सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ जजों को ही शामिल करने का प्रस्ताव था.
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महिलाओं की संसद में भागीदारी बढ़ाने का भी प्रस्ताव है. साथ ही उपसभापति और संसदीय समितियों के प्रमुख विपक्ष से चुने जाने की व्यवस्था की बात कही गई है.– इसके अलावा चार्टर न्यायपालिका की स्वतंत्रता मजबूत करने, चुनाव प्रणाली में सुधार और निष्पक्ष केयरटेकर सरकार की वापसी की भी सिफारिश करता है.


