तिब्बती धर्मगुरू दलाई लामा को मिला पहला ग्रैमी अवार्ड, भड़के चीन ने लगा दी यह तोहमत
चीन ने दलाई लामा को मिले ग्रैमी पुरस्कार की कड़ी निंदा की और इसे चीन विरोधी गतिविधियों को बढ़ावा देने वाला बताया. 90 वर्षीय दलाई लामा ने स्पोकन-वर्ड एल्बम के लिए पहला ग्रैमी जीता. बीजिंग ने इसे अलगाववादी छवि को मजबूत करने वाला करार दिया.

नई दिल्लीः चीन ने तिब्बती आध्यात्मिक नेता दलाई लामा को मिले ग्रैमी पुरस्कार की कड़ी निंदा की है. बीजिंग का कहना है कि यह सम्मान चीन विरोधी गतिविधियों को बढ़ावा देने का हथियार बन सकता है, जिसका वह दृढ़ता से विरोध करता है. दलाई लामा ने रविवार को लॉस एंजिल्स में हुए 68वें ग्रैमी अवॉर्ड्स में अपना पहला ग्रैमी जीता.
दलाई लामा का पहला ग्रैमी जीत
90 वर्षीय दलाई लामा ने स्पोकन-वर्ड एल्बम "मेडिटेशंस: द रिफ्लेक्शंस ऑफ हिज होलीनेस द दलाई लामा" के लिए बेस्ट ऑडियोबुक, नैरेशन एंड स्टोरीटेलिंग रिकॉर्डिंग कैटेगरी में यह पुरस्कार हासिल किया. यह उनके लिए संगीत जगत का पहला बड़ा सम्मान है. पुरस्कार मिलने के बाद दलाई लामा ने सोशल मीडिया पर संतोष जताया और कहा कि वे इसे व्यक्तिगत उपलब्धि नहीं, बल्कि सार्वभौमिक जिम्मेदारी की मान्यता मानते हैं. उन्होंने विनम्रता से कहा कि यह पुरस्कार ध्यान, करुणा और मानवता के मूल्यों को आगे बढ़ाने में मदद करेगा.
चीन की तीखी प्रतिक्रिया
सोमवार को चीनी विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता लिन जियान ने मीडिया ब्रीफिंग में इस पुरस्कार पर सवाल उठाए. उन्होंने दोहराया कि दलाई लामा सिर्फ धार्मिक नेता नहीं, बल्कि राजनीतिक निर्वासित हैं जो धर्म के नाम पर अलगाववादी गतिविधियां चलाते हैं. लिन ने कहा कि हम दृढ़ता से विरोध करते हैं कि कोई पक्ष इस पुरस्कार का इस्तेमाल चीन विरोधी राजनीतिक हेरफेर के लिए करे. चीन का लंबे समय से यह रुख है कि दलाई लामा तिब्बत को चीन से अलग करने की कोशिश करते हैं, जबकि बीजिंग तिब्बत को अपना अभिन्न हिस्सा मानता है.
प्रवक्ता ने जोर दिया कि ग्रैमी जैसे अंतरराष्ट्रीय मंचों को राजनीतिक रंग देने की कोशिशों का विरोध किया जाएगा. उन्होंने कहा कि दलाई लामा की अलगाववादी छवि को नजरअंदाज कर उन्हें सिर्फ आध्यात्मिक नेता के रूप में सम्मानित करना गलत है. चीन ने पहले भी कई मौकों पर दलाई लामा से जुड़े अंतरराष्ट्रीय सम्मानों की आलोचना की है, जैसे नोबेल शांति पुरस्कार.
क्या है तिब्बत विवाद
यह घटना तिब्बत मुद्दे पर चीन और दलाई लामा के बीच लंबे विवाद को फिर उजागर करती है. 1959 में तिब्बती विद्रोह के बाद दलाई लामा भारत भाग आए थे और तब से निर्वासित जीवन जी रहे हैं. चीन उन्हें खतरनाक अलगाववादी बताता है, जबकि दलाई लामा मध्यम मार्ग की नीति अपनाते हुए तिब्बत को स्वायत्तता की मांग करते हैं, न कि पूर्ण स्वतंत्रता.
दलाई लामा के ग्रैमी जीतने से वैश्विक स्तर पर ध्यान फिर तिब्बत की संस्कृति, ध्यान और शांति के संदेश पर गया है. लेकिन चीन की प्रतिक्रिया से साफ है कि बीजिंग इसे राजनीतिक संदेश के रूप में देखता है. यह पुरस्कार दलाई लामा के वैश्विक प्रभाव को दर्शाता है, जबकि चीन इसे अपने आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप मानता है.


