शिंदे गुट ने BJP को दिया धोखा! शिवसेना ने 29 पार्षदों का नामांकन BMC से लिया वापस, गठबंधन में आई दरार

एकनाथ शिंदे वाली शिवसेना ने अचानक से अपने 29 पार्षदों का नामांकन BMC से वापस ले लिया है. इस फैसले से महायुति गठबंधन में तनाव की खबरें तेज हो गई है.

Sonee Srivastav

महाराष्ट्र: महाराष्ट्र की सत्ताधारी महायुति गठबंधन में तनाव की खबरें तेजी से बढ़ रही है. मंगलवार 27 जनवरी को एकनाथ शिंदे वाली शिवसेना ने अचानक से अपने 29 पार्षदों का बृहन्मुंबई महानगरपालिका (BMC) के लिए नामांकन वापस ले लिया. इससे भारतीय जनता पार्टी (BJP) के साथ सत्ता बंटवारे पर मतभेद की अफवाहें जोर पकड़ रही है. 

यह फैसला इतना चौंकाने वाला था कि कई पार्षद पार्टी कार्यालय में ही रुक गए. गठबंधन के अन्य साथी भी हैरान रह गए. सूत्र बताते हैं कि यह कदम शिंदे समूह में बढ़ते गुस्से की वजह से उठाया गया. मुख्य रूप से बीएमसी में महत्वपूर्ण पदों का बंटवारा, जैसे समिति प्रमुख और महापौर का पद, इसमें बड़ा मुद्दा है. इन पदों पर नियंत्रण पाने की होड़ ने स्थिति को जटिल बना दिया है.

शिंदे की अनुपस्थिति ने बढ़ाया संदेह

उपमुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे कैबिनेट की बैठक से गायब रहे. वे मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस से मिलने भी नहीं पहुंचे. इसके बजाय, वे अपने पैतृक गांव चले गए और सतारा जिले में स्थानीय चुनावों के लिए प्रचार किया. इससे गठबंधन में असहमति की बातें और तेज हो गई. लोग सोच रहे हैं कि क्या यह सब सत्ता के खेल का हिस्सा है. 

महापौर पद पर पहले का प्रस्ताव

पहले शिंदे वाली शिवसेना ने मुंबई महापौर पद के लिए एक विशेष योजना रखी थी. इसमें पांच साल के कार्यकाल को दो हिस्सों में बांटा जाना था. पहले ढाई साल तक यह पद उनके पास रहता. पार्टी शिवसेना के संस्थापक बालासाहेब ठाकरे की जन्मशती के समय बीएमसी पर कब्जा रखना चाहती है. यह उनके लिए राजनीतिक और भावनात्मक रूप से बहुत अहम है. 

BJP के पास 89 सीटें

बीएमसी में भाजपा सबसे बड़ी पार्टी है, उसके पास 89 सीटें हैं. लेकिन अभी तक इस नए घटनाक्रम पर उन्होंने कोई खुली टिप्पणी नहीं की. शिंदे गुट के 29 पार्षद नगर निकाय में मजबूत भूमिका निभा रहे हैं. वे खुद को एक प्रभावी खिलाड़ी के रूप में देखते हैं. 

वहीं गठबंधन के नेता कहते हैं कि चर्चा चल रही है और सब कुछ ठीक है. लेकिन मंगलवार की घटना ने महायुति में दरार की अफवाहों को हवा दी है. दोनों पक्ष जोर देकर कह रहे हैं कि गठबंधन मजबूत रहेगा। फिर भी, राजनीतिक जानकार मानते हैं कि सत्ता बंटवारे पर समझौता जरूरी है, वरना स्थिति बिगड़ सकती है.

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