AI को वकील मत बनाओ, 'आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस' का सोच-समझकर इस्तेमाल करिए, HC जजों की कड़ी चेतावनी

हाईकोर्ट के जजों ने AI को लेकर गंभीर चिंता जताई है. उन्होंने कहा कि AI की गलतियां अब कई परेशानियां खड़ी कर रही हैं. एक उदाहरण देते हुए जज बोले-एक वकील ने याचिका में किसी पुराने केस का हवाला दिया, लेकिन जब सिटेशन मांगा गया तो उनके पास कोई स्रोत या रेफरेंस ही नहीं था.

Goldi Rai
Edited By: Goldi Rai

भारत, ब्रिटेन और अमेरिका के वरिष्ठ न्यायाधीशों ने सोमवार को आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के अदालतों में बढ़ते उपयोग को लेकर गंभीर चिंता जताई है. जजों ने वकीलों को सख्त चेतावनी देते हुए कहा कि ChatGPT जैसे AI टूल्स का इस्तेमाल अत्यंत सावधानी से किया जाना चाहिए और हर जानकारी की मूल स्रोत से जांच-पड़ताल अनिवार्य है. उन्होंने चेताया कि बिना सत्यापन के AI पर अंधविश्वास करने से वकील 'आर्टिफिशियल वकील' बनकर रह जाएंगे.

यह चर्चा चंडीगढ़ में इंडिया इंटरनेशनल डिस्प्यूट वीक 2026 के दौरान ओपन हैंड मॉन्यूमेंट पर आयोजित पैनल डिस्कशन में हुई, जिसमें राजस्थान हाईकोर्ट, पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट के जजों के अलावा ब्रिटेन और अमेरिका के न्यायाधीश भी शामिल हुए.

सुप्रीम कोर्ट गाइडलाइंस बनाने की तैयारी में

राजस्थान हाईकोर्ट के जस्टिस अरुण मोंगा ने कहा कि AI से तैयार किसी भी सामग्री को उसके मूल स्रोत से क्रॉस-चेक करना जरूरी है. उन्होंने एक हालिया उदाहरण देते हुए बताया कि ट्रायल कोर्ट के एक जज ने अपने आदेश में AI से उत्पन्न केस लॉ का हवाला दे दिया था. जस्टिस मोंगा ने बताया कि सुप्रीम कोर्ट संविधान के अनुच्छेद 142 के तहत AI के अदालती इस्तेमाल को नियंत्रित करने वाली गाइडलाइंस तैयार करने की प्रक्रिया में है.

'सुनवाई टालने की कोशिश करते हैं कुछ वकील'

पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट के जस्टिस विनोद भारद्वाज ने कहा कि टेक्नोलॉजी ने न्यायिक प्रक्रिया में कई सुविधाएं दी हैं, लेकिन AI की गलतियां नई समस्याएं भी खड़ी कर रही हैं. उन्होंने एक वास्तविक घटना का जिक्र करते हुए बताया कि एक याचिका में वकील ने ऐसे केस का हवाला दिया जिसका सिटेशन मांगने पर उनके पास कोई जवाब नहीं था. बाद में कोर्ट के रिसर्चर्स ने भी खोज की, लेकिन ऐसा कोई फैसला अस्तित्व में ही नहीं था. जस्टिस भारद्वाज ने कहा कि ऐसी स्थिति में जजों का काम कई गुना बढ़ जाता है, क्योंकि उन्हें उन फैसलों को भी जांचना पड़ता है जो असल में मौजूद ही नहीं होते. उन्होंने यह भी कहा कि कुछ वकील हाइब्रिड कोर्ट सिस्टम का दुरुपयोग करके मामलों की सुनवाई टालने की कोशिश करते हैं.

'न्यायिक फैसला इंसानों के हाथ में ही रहेगा'

पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट के जस्टिस हाकेश मनुजा ने कहा कि न्यायिक प्रक्रिया को पूरी तरह AI के हवाले नहीं किया जा सकता. उन्होंने कहा कि AI न्याय व्यवस्था की सहायता जरूर कर सकता है, लेकिन फैसला लेने की प्रक्रिया इंसानों के हाथ में ही रहनी चाहिए. जस्टिस मनुजा ने बताया कि केरल हाईकोर्ट में जजों के लिए एक AI टूल चल रहा है, जो केस फाइल और दलीलों का सार तैयार कर देता है. इससे जजों को फैसले लिखने के लिए अतिरिक्त समय मिल सकता है. हालांकि उन्होंने जोर दिया कि ऐसी जानकारी की भी जांच जरूरी है. उन्होंने यह भी कहा कि AI की ट्रेनिंग सिर्फ युवाओं को ही नहीं, बल्कि जजों को भी दी जानी चाहिए.

ब्रिटिश और अमेरिकी जजों का पक्ष

ब्रिटेन के फर्स्ट टियर ट्रिब्यूनल जज सुखी गिल ने कहा कि अदालतों में कई बार AI से तैयार सामग्री के कारण वकीलों को शर्मिंदगी का सामना करना पड़ा है. उन्होंने कहा कि AI से मिली जानकारी को कानून और केस लॉ से जरूर मिलान करना चाहिए. उन्होंने बताया कि ब्रिटेन में टेक्नोलॉजी की मदद से कई अनावश्यक अपीलों को रोका जा रहा है.

अमेरिका के टेक्सास स्थित हैरिस काउंटी सिविल कोर्ट की जज मनप्रीत मोनिका सिंह ने बताया कि अमेरिका में केस फाइलों का डिजिटलीकरण 2018 के बाद शुरू हुआ. उन्होंने कहा कि अमेरिका में टेक्नोलॉजी सपोर्ट के लिए भारत की मदद ली जाती है. अमेरिका में ज्यादातर मामलों की सुनवाई एक से डेढ़ साल के भीतर पूरी हो जाती है, लेकिन भारत में जजों के पास बहुत ज्यादा मामलों का बोझ होता है.

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