ग्रामीण मध्य प्रदेश में पानी बना साइलेंट किलर, हर तीसरा गिलास पीने लायक नहीं

मध्य प्रदेश के ग्रामीण इलाकों में पीने का पानी अब गंभीर स्वास्थ्य संकट बन चुका है. जल जीवन मिशन की ताज़ा रिपोर्ट ने खुलासा किया है कि गांवों में हर तीसरा गिलास पानी पीने के लिए सुरक्षित नहीं है, जिससे लाखों लोगों की सेहत खतरे में पड़ गई है.

Yogita Pandey
Edited By: Yogita Pandey

 

भोपाल: मध्य प्रदेश के ग्रामीण इलाकों में पीने का पानी अब केवल कमी का नहीं, बल्कि गंभीर सार्वजनिक स्वास्थ्य संकट का मुद्दा बन चुका है. रिपोर्ट्स के अनुसार गांवों में उपलब्ध हर तीसरा गिलास पानी मानव उपभोग के लिए असुरक्षित है, जिससे लाखों लोग अनजाने में दूषित पानी पीने को मजबूर हैं. 

यह संकट केवल नल कनेक्शन या जल आपूर्ति तक सीमित नहीं है, बल्कि पानी की गुणवत्ता से जुड़ा हुआ है. रिपोर्ट्स के आंकड़े साफ संकेत देते हैं कि राज्य में पेयजल व्यवस्था व्यापक स्तर पर विफल हो रही है और इसके दुष्परिणाम स्वास्थ्य संस्थानों से लेकर स्कूलों तक दिखाई दे रहे हैं.

जल गुणवत्ता में मध्य प्रदेश राष्ट्रीय औसत से काफी पीछे

4 जनवरी, रिपोर्ट्स के मुताबिक, मध्य प्रदेश में ग्रामीण क्षेत्रों से लिए गए केवल 63.3% जल नमूने ही गुणवत्ता परीक्षण में पास हो पाए. जबकि राष्ट्रीय औसत 76% है.

इसका मतलब है कि राज्य में 36.7% पेयजल नमूने जीवाणु या रासायनिक रूप से दूषित पाए गए.

अस्पतालों में हालात सबसे गंभीर

रिपोर्ट में स्वास्थ्य संस्थानों की स्थिति को बेहद चिंताजनक बताया गया है.सरकारी अस्पतालों में लिए गए पानी के नमूनों में से केवल 12% ही माइक्रोबायोलॉजिकल सुरक्षा परीक्षण में खरे उतरे, जबकि राष्ट्रीय औसत 83.1% है. इसका अर्थ है कि मध्य प्रदेश के करीब 88% सरकारी अस्पतालों में मरीजों को असुरक्षित पानी उपलब्ध कराया जा रहा है.

स्कूलों में भी बच्चों को मिल रहा दूषित पानी

ग्रामीण स्कूलों में भी स्थिति बेहतर नहीं है. रिपोर्ट के अनुसार, 26.7% स्कूलों के जल नमूने माइक्रोबायोलॉजिकल परीक्षण में फेल हो गए, जिससे बच्चे रोज़ाना दूषित पानी के संपर्क में आ रहे हैं.

आदिवासी जिलों में हालात बेहद खराब

राज्य के आदिवासी बहुल जिलों में संकट और गहराता नजर आया.अनूपपुर और दिंडोरी में जांचा गया एक भी जल नमूना सुरक्षित नहीं पाया गया.वहीं बालाघाट, बेतूल और छिंदवाड़ा जिलों में 50% से अधिक नमूने दूषित निकले.

नल कनेक्शन हैं, लेकिन पानी सुरक्षित नहीं

मध्य प्रदेश में केवल 31.5% घरों में ही नल कनेक्शन हैं, जबकि राष्ट्रीय औसत 70.9% है. जहां पाइपलाइन मौजूद है, वहां भी व्यवस्था जर्जर है. 99.1% गांवों में पाइपलाइन तो है, लेकिन केवल 76.6% घरों में ही नल काम कर रहे हैं. यानी हर चौथा घर या तो खराब नल से जूझ रहा है या उसे पानी ही नहीं मिल रहा.

सबसे गंभीर बात यह है कि नल से पानी आना, सुरक्षित पानी मिलने की गारंटी नहीं है. इंदौर जिले, जिसे 100% नल कनेक्शन वाला घोषित किया गया है, वहां भी केवल 33% घरों को ही पीने योग्य पानी मिल पा रहा है.

केंद्र सरकार की चेतावनी

राज्य भर में 33% जल नमूने गुणवत्ता परीक्षण में असफल पाए गए हैं. इसे देखते हुए केंद्र सरकार ने इस स्थिति को "प्रणालीगत आपदा" करार दिया है और चेतावनी दी है कि यदि जल गुणवत्ता में सुधार नहीं हुआ तो अनुदान में कटौती की जा सकती है.

दूषित पानी से मौतें और हाईकोर्ट की सख्त टिप्पणी

यह चेतावनी इंदौर के भागीरथपुरा इलाके में हुई एक दर्दनाक घटना के बाद आई, जहां दूषित पानी पीने से 18 लोगों की मौत हो गई. 429 लोग अस्पताल में भर्ती कराए गए, जिनमें से 16 आईसीयू में हैं और 3 वेंटिलेटर पर जीवन के लिए संघर्ष कर रहे हैं.

मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय ने इस स्थिति को सार्वजनिक स्वास्थ्य आपातकाल मानते हुए कहा कि  "अनुच्छेद 21 के तहत जीवन के अधिकार में स्वच्छ पेयजल का अधिकार भी शामिल है", और मौजूदा हालात उसी दायरे में आते हैं.

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